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बुधवार, जनवरी 20

कुछ ख्याल


कुछ ख्याल 


‘कुछ’ होने से ‘कुछ नहीं’ हो जाना  

इश्क का इतना सा ही तो फ़साना  


चुप रहकर ही यह बयां होता है 

आवाजों में बस रुसवा होता है 


सुनो, सुनो और कुछ न कहो

उसी धारा में चुपचाप बहो 


उससे बढ़कर न कुछ था न होगा जमाने में 

उसी को आने दो हर बात, हर तराने में 


लाख पर्दों में छिपा हो हीरा चमक खो नहीं सकता 

जो सब कुछ है, वह कुछ नहीं में न हो, हो नहीं सकता 


मिट-मिट कर भी जो रह जाता है 

वह उसकी याद में गुनगुनाता है


 

रविवार, मई 3

उसका होना

उसका होना


कोई रेशमी सा ख्याल या 
इंद्रधनुष अटका अम्बर में, 
मादक मीठी तान गूँजती 
कोमल कमल खिला सर्वर में !

कोई ज्यों आवाज दे रहा 
हरियाली सी बिछी डगर पर,
मखमली पगत्राण धरे हों, 
या फूलों के दल हों पथ पर ! 

जैसे कोई लड़ी गीत की
या कोई अनकही कहानी,
रस्ता दिखलाती जाती हो
झरनों में जो बसी रवानी !

हौले हौले से छूती हो, 
कोई अनजानी फुहार या, 
धीमे-धीमे से बहती हो, 
पूरब की मीठी बयार या !

मेघों में जा छुपा सूर्य क्या, 
कोई तृप्ति शाल ओढ़ाकर,
तकता हो बनकर आशीषें, 
जीवन का सुअर्थ महकाकर !

कोई अपने हाथों से आ, 
सहला जाता उर का पाखी, 
पंखों में उड़ान भर जाता, 
देकर खबर किसी मंजिल की !