कुछ ख्याल
‘कुछ’ होने से ‘कुछ नहीं’ हो जाना
इश्क का इतना सा ही तो फ़साना
चुप रहकर ही यह बयां होता है
आवाजों में बस रुसवा होता है
सुनो, सुनो और कुछ न कहो
उसी धारा में चुपचाप बहो
उससे बढ़कर न कुछ था न होगा जमाने में
उसी को आने दो हर बात, हर तराने में
लाख पर्दों में छिपा हो हीरा चमक खो नहीं सकता
जो सब कुछ है, वह कुछ नहीं में न हो, हो नहीं सकता
मिट-मिट कर भी जो रह जाता है
वह उसकी याद में गुनगुनाता है
