बुधवार, अगस्त 26
श्वासों की समिधा को
बुधवार, नवंबर 5
चाह जब जागे मिलन की
चाह जब जागे मिलन की
निज आत्म में जागना है
न कि जगत से भागना है,
मिला बाहर, वही भीतर
नहीं अब कुछ माँगना है !
भाव अपना शुद्ध हो जब
प्रेम रस भीतर रिसेगा,
मधुर प्रकाश ज्योत्सना का
सहज उर से छन बहेगा !
श्रद्धा की भूमि ह्रदय में
पुष्प कोमल भावना के,
चाह जब जागे मिलन की
भाव हों आराधना के !
वह अदेखा, वह अजाना
निकट से भी निकट लगता,
सुरभि सुमिरन की अनोखी
पोर-पोर प्रमुदित होता !
माँग जो भी, वह मिला है
तुझसे न कोई गिला है,
कभी कुम्हलाया न अंतर
जिस घड़ी से यह खिला है !
शनिवार, दिसंबर 23
मेघा ढूँढें आसमान को
मेघा ढूँढें आसमान को
मंज़िल पर ही बैठ पूछता
और कहाँ ? कितना जाना है ?
क्यों न कहें उर को दीवाना
अब तक भेद नहीं जाना है !
सागर में रहकर ज्यों लहरें
घर का पता पूछती मिलतीं,
मेघा ढूँढें आसमान को
घोर घटाएँ नीर खोजतीं !
लिए प्रेम का एक सरोवर
प्यासा उर प्यासा रह जाता,
पनघट तीर खड़ा है राही
इधर-उधर तक टोह लगाता !
भीतर एक आँख जगती है
कोई साथ चला करता है,
देख न पाये चाहे उसको
योग-क्षेम धारण करता है !
आराध्य बना लेगा अंतर
मस्तक जिस दिन झुक जाएगा,
गीत समर्पण के फूटेंगे
प्राणों में बसंत छायेगा !
मंगलवार, जनवरी 19
बस इतना सा ही सरमाया
गुरुवार, अक्टूबर 22
निकट है जो सदा अपना
निकट है जो सदा अपना
है अधूरा हर समर्पण
कहाँ कुछ हम छोड़ पाते,
प्रेम पाना चाहते पर
राज उर में भी छुपाते !
निकट है जो सदा अपना
खोजते हम दूर नभ में,
चाहतों से दिल भरा यह
एक उसकी भी दिखाते !
छिपे अपने लक्ष्य कितने
उन्हें कैसे भूलता मन,
सिर झुका है द्वार उसके
स्वप्न निज सुख का सजाते !

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