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बुधवार, अगस्त 26

श्वासों की समिधा को

श्वासों की समिधा को 


श्वासों की समिधा को
अंतर की हवि कर दें,
पल-पल में जी लें फिर
सुंदर की छवि भर लें !

उर के घट पावन में
प्रियतम जो बसता है,
अर्पण कर भाव सभी
मन मयूर तकता है !

पावक है शीतल सी
छुवन बड़ी कोमल सी,
हर पल का साक्षी वह
स्मृतियाँ अति श्यामल सी !

श्वासों की माला को
हर पल ही याद रखें,
उसको ही कर अर्पित
मुक्ति का स्वाद चखें !

अर्थहीन सा जीवन
क्रीड़ा इक बन भाए,
कृत्यों का करना ही
उनका फल बन जाये !

जैसे वह बाँट रहा
दोनों ही हाथों से,
भर झोली बिखराएं
हम कुछ सौगातों से !

दाता वह दानी बन
ज्ञाता वह ज्ञानी बन,
उसकी ही थाती को
चरणों पर कर अर्पण !

उसकी महाशक्ति को
जगकर हम पहचानें,
उसकी महाभक्ति को
जीवन का फल मानें !

भीतर जो रहता है
युग-युग का है साथी,
मौनी जब होता मन
झलकाता शुभ ज्योति!

बुधवार, नवंबर 5

चाह जब जागे मिलन की

चाह जब जागे मिलन की 


निज आत्म में जागना है 

न कि जगत से भागना है, 

मिला बाहर, वही भीतर 

नहीं अब कुछ माँगना है !


भाव अपना शुद्ध हो जब 

प्रेम रस भीतर रिसेगा, 

मधुर प्रकाश ज्योत्सना का 

सहज उर से छन बहेगा !


श्रद्धा की भूमि ह्रदय में 

पुष्प कोमल भावना के, 

चाह जब जागे मिलन की 

भाव हों आराधना के !


वह अदेखा, वह अजाना 

निकट से भी निकट लगता, 

सुरभि सुमिरन की अनोखी 

पोर-पोर प्रमुदित होता ! 


माँग जो भी, वह मिला है  

तुझसे न कोई गिला है, 

कभी कुम्हलाया न अंतर 

जिस घड़ी से यह खिला है !


शनिवार, दिसंबर 23

मेघा ढूँढें आसमान को

मेघा ढूँढें आसमान को 


मंज़िल पर ही बैठ पूछता 

और कहाँ ? कितना जाना है ?

क्यों न कहें उर को दीवाना 

अब तक भेद नहीं जाना है !


सागर में रहकर ज्यों लहरें 

घर का पता पूछती मिलतीं,

मेघा ढूँढें आसमान को 

घोर घटाएँ नीर खोजतीं !


लिए प्रेम का एक सरोवर 

प्यासा उर प्यासा रह जाता, 

पनघट तीर खड़ा है राही 

इधर-उधर तक टोह लगाता !


भीतर एक आँख जगती है 

कोई साथ चला करता है, 

देख न पाये चाहे उसको 

योग-क्षेम धारण करता है !


आराध्य बना लेगा अंतर 

मस्तक जिस दिन झुक जाएगा, 

गीत समर्पण के फूटेंगे  

प्राणों में बसंत छायेगा !


मंगलवार, जनवरी 19

बस इतना सा ही सरमाया

बस इतना सा ही सरमाया

गीत अनकहे, उश्ना उर की 
बस इतना सा ही सरमाया ! 

काँधे पर जीवन हल रखकर 
धरती पर जब कदम बढाये 
कुछ शब्दों के बीज गिराकर  
उपवन गीतों से महकाए ! 

प्रीत अदेखी, याद उसी की 
बस इतना सा ही सरमाया ! 

कदमों से धरती जब नापी
अंतरिक्ष में जा पहुँचा मन 
कुछ तारों के हार पिरोये 
डोल चन्द्रमाओं के सँग-सँग  ! 

कभी स्मृति कभी जगी कल्पना 
बस इतना सा ही सरमाया ! 

गुरुवार, अक्टूबर 22

निकट है जो सदा अपना

  निकट है जो सदा अपना

है अधूरा हर समर्पण 

कहाँ कुछ  हम  छोड़ पाते, 

प्रेम पाना चाहते पर 

राज उर में भी छुपाते !


 निकट है जो सदा अपना 

खोजते हम दूर नभ में,

चाहतों से दिल भरा यह 

एक उसकी भी दिखाते !


छिपे अपने लक्ष्य कितने 

उन्हें कैसे भूलता मन, 

सिर झुका है द्वार उसके 

स्वप्न निज सुख का सजाते !


मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !

रविवार, मई 3

उसका होना

उसका होना


कोई रेशमी सा ख्याल या 
इंद्रधनुष अटका अम्बर में, 
मादक मीठी तान गूँजती 
कोमल कमल खिला सर्वर में !

कोई ज्यों आवाज दे रहा 
हरियाली सी बिछी डगर पर,
मखमली पगत्राण धरे हों, 
या फूलों के दल हों पथ पर ! 

जैसे कोई लड़ी गीत की
या कोई अनकही कहानी,
रस्ता दिखलाती जाती हो
झरनों में जो बसी रवानी !

हौले हौले से छूती हो, 
कोई अनजानी फुहार या, 
धीमे-धीमे से बहती हो, 
पूरब की मीठी बयार या !

मेघों में जा छुपा सूर्य क्या, 
कोई तृप्ति शाल ओढ़ाकर,
तकता हो बनकर आशीषें, 
जीवन का सुअर्थ महकाकर !

कोई अपने हाथों से आ, 
सहला जाता उर का पाखी, 
पंखों में उड़ान भर जाता, 
देकर खबर किसी मंजिल की !

मंगलवार, अप्रैल 14

उर दर्पण में उसको देखा

उर दर्पण में उसको देखा 


उर दर्पण में ‘उसको’ देखा 
‘उसको’ यानि स्वयं को देखा,
आश्वस्ति की लहर छू गयी
जब-जब भीतर जाकर देखा !

पहले-पहले गहन बवंडर 
झंझावात बहुत उठेंगे, 
अनजाने रस्तों पर मन के 
बीहड़ कंटक पाहन होंगे !

लेकिन दूर कहीं से कोई 
झरने की कल-कल भी आती, 
कभी किसी पंछी की कुह-कुह
मधुरिम कोई प्यास जगाती !

निकट कहीं ही वह बसता है 
श्रद्धा दीप न बुझने पाए, 
बढ़ता रहे निरन्तर राही 
मंजिल इक दिन सम्मुख आए !

एक झलक जो भी पा लेता 
जग में नहीं अजनबी रहता,
पर्वत नदिया बादल उपवन 
सबसे दिल का नाता बनता ! 

कुदरत से संघर्ष नहीं हो 
मानव उसका एक अंश है, 
माँ से दूर गया हो बालक 
चुभता उर में सदा दंश है !

अवसर एक हाथ आया है 
अंबर से हम नाता जोड़ें, 
धरती पर जब पाँव धरें तो 
माँ कहकर ही नमन भी करें ! 

सोमवार, मार्च 9

होली

होली

रंग भरे जीवन में जिसने 
हर इक पल उसकी होली है, 
संशय सभी जला डाले फिर
हर करवट हँसी ठिठोली है !

मन मतवाला भूल भी जाय 
कुदरत ले निकली टोली है, 
रंगों की भाषा जो जाने 
हर कदम जहाँ रंगोली है !

नीला अम्बर, रवि नारंगी 
मेघ सलेटी, पंछी श्वेत,
हरी घास पर पीली मैना 
रक्तिम पुष्प, सुनहरे खेत !

अग्नि की पीली ज्वाला में
बैर भाव सबके जल जाएँ, 
उर की गहराई में सोया 
शुभ आह्लाद पुनः जग जाये !

मंगलवार, नवंबर 26

मन


मन 

सोया है मन युगों-युगों से
सुख स्वप्नों में खोया भी है

कुछ झूठे अंदेशों पर फिर
रह-रह नादां रोया भी है

सुख-दुःख की लहरों पर चढ़कर
दामन व्यर्थ भिगोया भी है

माया के कंटक से बिंधकर
अश्रुहार पिरोया भी है

प्रेम पीर से आहत होकर
अंतर राग समोया भी है

सूखे पत्तों से भरा हुआ
उर का आंगन धोया भी है

पुनः-पुनः उसी राह पर जाये
सुनी सीख यह गोया भी है

शनिवार, जून 22

योग करो


योग करो


ख़ुशी से जीना यदि चाहते
शांति हृदय की सदा खोजते
तन निरोग बने, यदि मांगते
योग करो !

दूर अकेलापन करने को
उर का खालीपन भरने को
तन की हर पीड़ा हरने को
योग करो !

अति समृद्धिशाली होने को
दिल की हर कटुता धोने को
नये स्वप्न मन में बोने को
योग करो !

मैत्री का उपवन खिलाने
जग को अपना मीत बनाने
धार प्रीत की मधुर बहाने
योग करो !

अद्वैत का स्वाद हो लेना
उर सागर में गहरे जाना
ध्यान सहज यदि चाहो पाना
योग करो !


शुक्रवार, दिसंबर 14

घाटियाँ जब खिलखिलायीं


घाटियाँ जब खिलखिलायीं

बह रही थी नदी उर की
बने पत्थर हम अड़े थे,
सामने ही था समुन्दर
नजर फेरे ही खड़े थे !

गा रहा था जब कन्हैया
बांसुरी की धुन सुनी ना,
घाटियाँ जब खिलखिलायीं
राह भी उनकी चुनी ना !

भीगता था जब चमन यह
बंद कमरों में छिपे थे,
चाँद पूनो का बुलाता
नयन स्वप्नों से भरे थे !

सुख पवन शीतल बही जब
चाहतों की तपिश उर में,
स्नेह करुणा वह लुटाता
मांगते थे मन्दिरों में !

आज टूटा भरम सारा
झूमती हर इक दिशा है,
एक से ही नूर बरसे
प्रातः हो चाहे निशा है !
 


सोमवार, जुलाई 23

पावन प्रीत पुलक सावन की



पावन प्रीत पुलक सावन की

कितने ही अहसास अनोखे
कितने बिसरे ख्वाब छिपे हैं,
खोल दराजें मन की देखें
अनगिन जहाँ सबाब छिपे हैं !

ऊपर-ऊपर उथला है जल
कदम-कदम पर फिसलन भी है,
नहीं मिला करते हैं मोती
इन परतों में दलदल भी है !

थोड़ा सा खंगालें उर को
जाल बिछाएं भीतर जाकर,
चलें खोजने सीप सुनहरे
नाव उतारें बचपन पाकर !

पावन प्रीत पुलक सावन की
या फिर कोई दीप जला हो,
गहराई में उगता जीवन
नीरव वन में पुहुप खिला हो !

अम्बर से जो नीर बरसता
गहरे जाकर ही उठता है,
कल का सूरज जो लायेगा
वही उजास आज झरता है !  




गुरुवार, अप्रैल 26

कोई देख-देख हँसता है



कोई देख-देख हँसता है

आँख मुँदे उसके पहले ही
क्यों ना खुद से नजर मिला लें,
अनदेखे, अनजाने से गढ़
भेद अलख के मोती पा लें !

कितना पाया पर उर रीता
झांकें, इसकी पेंदी देखें,
कहाँ जा रहा आखिर यह जग
तोड़ तिलिस्म जाग कर लेखें !

बार-बार कृत-कृत्य हुआ है
फिर क्यों है प्यासा का प्यासा,
किस कूँए से तृषा बुझेगी
आखिर इसको किसकी आसा !

सुंदरता को बाँध न पाया
देखे कितने सागर, पर्वत,
कहीं और कुछ छूटा जाता
सदा बनी पाने की हसरत !

सुख का आकांक्षी यह उर है
जाने किसकी राह जोहता,
पा पाकर भी कुछ ना पाया
ज्यों तामस में बाट टोहता !

मंजिल पर बैठा राही जब
राह पूछता बन अनजाना,
कोई देख-देख हँसता है
जैसे खेले इक दीवाना !

शनिवार, मार्च 11

जीवन स्वप्नों सा बहता है



जीवन स्वप्नों सा बहता है 


आज नया  दिन 
अग्नि समेटे निज दामन में 
उगा गगन में अरुणिम सूरज 
भर उर में सुर की कोमलता 
नये राग छेड़े कोकिल ने 
भीगी सी कुछ शीतलता भर 
नई सुवास हवा ले आयी
मंद स्वरों में गाती वसुधा 
 पल भर में हर दिशा गुँजाई 
उड़ी अनिल सँग शुष्क पत्तियां 
कहीं झरे पुहुपों के दल भी 
तिरा गगन में राजहंस इक 
बगुलों से बादल के झुरमुट 
नीला आसमान सब तकता 
माँ जैसे निज संतानों को 
जीवन स्वप्नों सा बहता है 
भरे सुकोमल अरमानों को...

शनिवार, अक्टूबर 25

पंख लगें उर की सुगंध को

पंख लगें उर की सुगंध को



दिल में किसी शिखर को धरना
सरक-सरक कर बहुत जी लिए,
पंख लगें उर की सुगंध को
गरल बंध के बहुत पी लिए !

जाना है उस दूर डगर पर
जहाँ खिले हैं कमल हजारों,
पार खड़ा कोई लखता है
एक बार मन उसे पुकारो !

जहाँ गीत हैं वहीं छिपा वह
शब्द, नि:शब्द युग्म के भीतर,
भीतर रस सरिता न बहती
यदि छंद बद्ध न होता अंतर !

सागर सा वह मीन बनें हम
संग धार के बहते जाएँ,
झरने फूटें सुर के जिस पल
 झरे वही, लय में ले जाये !

रिक्त रहा है जो फूलों से
विटप नहीं वह बन कर रहना,
गंध सुलगती जो अंतर में
वह भी चाहे अविरत बहना !

निशदिन जो बंधन में व्याकुल
मुक्त उड़े वह नील गगन में,
प्रीत झरे जैसे झरते हैं
हरसिंगार प्रभात वृक्ष से  !




  

मंगलवार, अगस्त 5

उर उसी पी को पुकारे

उर उसी पी को पुकारे


झिलमिलाते से सितारे
झील के जल में निहारें,
रात की निस्तब्धता में
उर उसी पी को पुकारे !

थिर जल में कीट कोई
खलबली मचा गया है,
झूमती सी डाल ऊपर
कोई खग हिला गया है !

दूर कोई दीप जलता
राह देखे जो पथिक की,
कूक जाती पक्षिणी फिर
नींद खुलती बस क्षणिक सी !

स्वप्न ले जगत सारा
रात्रि भ्रम जाल डाले,
कालिमा के आवरण में
कृत्य कितने ही निभा ले !