अमी प्रेम का
जब बन जाता है मन
कोरे कागज सा
तब उकेर देता है अस्तित्त्व
उस पर एक ऐसी इबारत
जो पढ़ी नहीं जाती
महसूस होती है
हवा की तरह नामालूम सी
सर्दियों के सूरज की मानिंद
नर्म और गर्म
परों सा हल्का होकर
उड़ने लगता है
मन का पंछी
न ही अतीत का गट्ठर
न भावी का डर
अनंत की सुवास भरे
खिलने लगता है
स्मृति इक जंजीर है
विकल्प इक आवरण
रिक्त हुआ जब घट बासी जल से
तब भर देता है अस्तित्व
अमी प्रेम का सुमधुर
एक घूँट पर्याप्त है
उस रस स्रोत में डूबने के लिए
कोई जाने या न जाने
उस के भीतर भी यही
तलाश है
चखने की चाह जिसे
वह जीवन प्रकाश है !
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