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सोमवार, अक्टूबर 6

चक्र से बाहर

चक्र से बाहर 


आने दो यादों के बादल 

छाने दो भावों के बादल, 

वर्तमान का नभ अनंत है 

तिरने दो शब्दों के बादल !


उड़ें हवा संग, हों काफ़ूर 

बहकर यहाँ से जायें दूर, 

नीला गगन स्वच्छ निर्मल पर 

सदा अचल, रहे अडिग हुज़ूर !


तुम भी तो कुछ उसके जैसे 

कहाँ ख़त्म होती है सीमा, 

हर पल नया रूप धर आये 

दिखे न परिवर्तन, हो धीमा !


माना जाह्नवी अति पुरातन 

जल इस क्षण में नया आ रहा, 

एक चक्र में घूमती सृष्टि 

हो जो बाहर, वही देखता !


सोमवार, जनवरी 6

तम की कारा में दुख झेला

तम की कारा में दुख झेला 


तम की कारा में दुख झेला 

राजस मुक्ति पथ दिखलाता, 

सत ने सत्य  को दिया आश्रय 

लेकिन क्रम पुन: तम का आया !


एक  चक्र में घूम रहे जन 

बार-बार वे गलियाँ आतीं, 

जिनमें दंश कभी पाये थे 

फिर भी कदम वहीं लिए जातीं !


निज भूलों को भाग्य बताकर   

निज करनी से बाज न आते, 

जिस राह  पर मिले थे काँटे 

फिर-फिर उस पर कदम बढ़ाते  !


स्वयं ज्ञान का करें अनादर 

सुख  चाहों  में दौड़े जाते, 

तृष्णा मन की तृप्त न होगी 

अटल सत्य यह फिर बिसराते  !


सतयुग से कलयुग तक पहुँचे  

 अब फिर से ऊपर जाना है, 

थम जाये यह बस सतयुग में 

 इक नया विधान बनाना है !



शनिवार, मार्च 2

अपना-अपना स्वप्न देखते


अपना-अपना स्वप्न देखते


एक चक्र है सारा जीवन
जन्म-मरण पर अवलंबित,
एक ऊर्जा अविरत बहती
हुई कभी न जो खंडित !

एक बिंदु से शुरू हुआ था
वहीं लौट कर आता है,
किन्तु पुनः नया जीवन
नए कलेवर में आता है !

पंछी, मौसम जीव सभी तो
इसी चक्र से बंधे हुए,
अपना-अपना स्वप्न देखते
नयन सभी के मुंदे हुए !

हुई शाम तो कहीं अजान
कहीं मंत्र, सुवासित धूप,
कहीं आरती, वन्दन अर्चन
कहीं सजा है सुंदर रूप !

एक दिवस अब खो जायेगा
समा काल के भीषण मुख में,
कभी लौट कर न आयेगा
बीता चाहे सुख में दुःख में !

एक रात्रि होगी अन्तिम
तन का दीपक बुझा जा रहा,
यही गगन तब भी तो होगा
 पल-पल करते समय जा रहा !