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शनिवार, जुलाई 8

जादूगर और माया


जादूगर और माया


चला आता उसी तरह दुःख पीछे सुख के
जैसे आदमी के पीछे उसकी छाया
भर दामन में ख़ुशी बाँटने निकले कोई
तो बदल देती है गमों में उसको माया
भरें हर्जाना यदि चाहा सुख कण भर भी
चुकायें कीमत हर आसक्ति हर मोह की
कुछ भी यहाँ मुफ्त नहीं मिलता
बिना एक हुए माटी से कोई बीज नहीं खिलता
जब चाह जगे भीतर सत् को पाने की
तब जाकर ही इस खेल की पहचान होगी
भीतर जाने कौन से गह्वर में रहता है इक जादूगर
जिसे रास नहीं आता तिल भर भी नकार
दिखाता है वही तो आईना बार-बार !


शुक्रवार, सितंबर 11

एक और अनेक


एक और अनेक

जैसे आकाश एक बाहर है चहुँ ओर
वैसा ही भीतर है..
जिसमें चमकता है एक सूरज
मन के पानियों को जो
उड़ा ले जाता है द्युलोक में
भाव सुगंध भरे
फिर बरस जाती है धारा तृप्ति की
तन की माटी लहलहाने लगती है
बाहर और भीतर का आकाश
कहने को ही दो हैं
वैसे ही जैसे बाहर और भीतर का सूरज
एक पानी से दूसरे का गहरा नाता है
और पुष्प की गंध से भाव सुगंधि का
एक ही है जो अनंत होकर जीता है
पल-पल की खबर रखता वह जादूगर
जाने कैसे यह खेल रचता है !