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बुधवार, जुलाई 1

एक सनातन वृक्ष जगत है

एक सनातन वृक्ष जगत है

क़ुदरत में ही सदा अवस्थित

सुख-दुख रूपी फल लगते हैं,

त्रिगुण रूपी मूल अति  गहरी 

एक सनातन वृक्ष जगत है !

 

पंच भूत, मन, बुद्धि, अहंता  

सदा अष्ट शाखाओं वाला

सप्त धातुएँ छाल बनी हैं

एक सनातन वृक्ष जगत है !

 

नौ द्वारों के कोटर इसमें 

दस प्राण बने पत्ते जिस पर

रस देता पुरुषार्थ रूप में

एक सनातन वृक्ष जगत है !

 

पंच इन्द्रियों से हम जानें  

उत्पन्न होकर बढ़े व मिटे

दो पंछी रहते हैं जिस पर

एक सनातन वृक्ष जगत है !


गुरुवार, मार्च 2

जीने की अभिलाषा ऐसी

जीने की अभिलाषा ऐसी 


ढगा जा रहा दीवाना  मन

अपनी ही क़ैदों में  जकड़ा, 

उलझा  रहा व्यर्थ बंधन में 

खुद  की ही छाया को पकड़ा !


जीने की अभिलाषा ऐसी 

इधर-उधर की  माया जोड़ी,

फ़ूलों पत्तों  से मढ़वाकर 

अहंकार की चादर ओढ़ी !


भ्रम पाले अनेक  अंतर में 

एक-एक कर टूटा करते,

सुख की उम्मीदें ही रहतीं 

दुःख के बादल फूटा करते !


जिसका यह विस्तार पसारा,

वह अनंत जो जान रहा है 

लेक़र उससे कुछ उधार पल 

यह मानस  संसार रहा है !


जानी जान और है दूजा

यह उसके बल पर  इतराता, 

समझे यह जग को भोगे है 

किंतु उसका ग्रास बन जाता !


स्वयं जाल बुनता रिश्तों  के 

आहत भी अपने बल होता,

रंग, रूप, गंध औ’ स्वाद के 

द्वारा नित इससे छल होता !


बोध जगे ना जब तक भीतर

ऐसे ही आना-जाना  है,

सुख-दुःख  के इस मकड़ जाल  में 

फँसे हुए बस  मुस्काना है ! 

शुक्रवार, नवंबर 11

अब तो इक ही धुन बजती है

अब तो इक ही धुन बजती है


अब जब तुम हो साथ हमारे 

 खोज रहे तब भला किसे हम, 

श्वासों में हो,  प्राणों  में तुम 

ढूँढे भला किसे नादां मन !


वाणी मुखर नहीं अब रहती 

सिमट शब्द ज्यों  भीतर सोए, 

 निशदिन उस का साथ मिला है 

जिसे पुकारा करते थे वे  !


यूँही समय बिताने ख़ातिर 

आँख मिचौली खेल रहे थे, 

ढूँढने का बहाना करते

तुम तो सारा वक्त यहीं थे  !


कैसे कहें तुम्हारी  बातें 

बढ़ा गयी थीं दिल की धड़कन,

जब आँखों में फूल खिले थे 

कैसे दें उस पल का विवरण!


कोई बोध नहीं पाया है 

 किया न कोई कर्म अनूठा,

 कैसे साधें भक्ति भला जब 

पृथक नहीं तुमको जाना है !


दुःख बिसराया सुख भी छूटा 

अब तो इक ही धुन बजती है, 

तुम हो, जग है, नयन देखते 

पल-पल यह धरती सजती है !


एक लगन भीतर जागी थी 

जिसने अब अधिकार किया है, 

उसे छुड़ाया जो पकड़ा था 

केवल अजर दुलार दिया है !


सोमवार, मई 30

तथागत ने कहा था

तथागत ने कहा था


ऐसा है, इसलिए वैसा होगा 

उससे बचना है, तो इसे तजना होगा 

तथागत ने कहा था !

पल-पल बदल रहा जगत

जहाँ जुड़ी है हर वस्तु दूसरे से

थिर नहीं तन-मन दोनों 

 आश्रित इकदूजे पर 

इनसे प्रेम करना तो ठीक है 

पर उम्मीद करना 

इनके लिए प्रेम की 

दुःख ही उपजाता 

है वह सदा एक 

 जहाँ से प्रेम आता  

अनुभव बदल जाएं पर 

 नहीं बदलता अनुभवी

उसे जान सकता है 

दुःख के पार हुआ मन ही !

 

सोमवार, मई 16

नहीं चाहिए

नहीं चाहिए 


किसी को नहीं चाहिए 

कोई भी दुःख, पीड़ा या उलझन 

मिला भी है उसे हज़ार बार प्रेम का वर्तन !

पर याद करता है केवल उदासी के लम्हे

सुख के सूरज की छवि बने भी तो कैसे  

सुस्वप्नों की स्मृति कहाँ आई  

 पर झट जमा लेता है दुःख की काई 

सुरति से स्वच्छ करना होगा  

फिर आशा और विश्वास का जल भरना होगा 

उर आनंद लहरियाँ स्वतः उठेंगी 

भीतर-बाहर सब शीतल करेंगी 

हमें वरदानों को सम्मुख करना है 

क्योंकि इस धरा पर पहले से ही 

काफ़ी है बोझ दुखों का 

निर्भार होकर हर कदम रखना है ! 




गुरुवार, अगस्त 19

इक अकुलाहट प्राणों में

इक अकुलाहट प्राणों में

 

इक दुःख की चाहत की है

जो मन को बेसुध कर दे,

कुछ कहने, कुछ ना कहने

दोनों का अंतर भर दे !

 

इक पीड़ा माँगी उर ने

जो भीतर तक छा जाये,

फिर वह सब जो आतुर है ​

आने को बाहर आये !

 

इक बेचैनी सी हर पल

मन में सुगबुग करती हो,

इस रीते अंतर्मन का

कुछ खालीपन भरती हो !

 

इक अकुलाहट प्राणों में

इक प्यास हृदय में जागे,

सीधे सपाट मरुथल में

चंचल हरिणी सी भागे 

 

सोमवार, अगस्त 9

वही जानता एक हुआ जो

खो जाए जिसके दर पे, ‘मैं’ का यह सिलसिला ​​

उसके यहाँ ही जाकर, सिर को झुकाना होगा 


फ़िक्रों को छोड़ देना, रस्ते में जाते-जाते 

हर सुख वहीं मिलेगा, जहाँ नाम उसका होगा 


वही जानता एक हुआ जो 

सुख को चुन लेते फूलों सा 

दुःख के काँटे नहीं माँगते, 

मधुर याद से दामन भर लें 

हर कटुता को रहे भुलाते !


मन की ऐसी ही माया है 

अनुयायी है राग-द्वेष का,

भला-बुरा औ' प्रेम घृणा में 

बाँटा जग को पूर्ण न देखा !


दो में बाँटा जिस पल हमने 

भ्रम बढ़ता जाता जीवन में, 

पार हुआ जो देखे इसको 

वही टिका रहता है सच में !


रात छोड़कर दिन को पकड़े 

ऐसा कहाँ हुआ है संभव, 

मिले लक्ष्मी नारायण तजे  

शिव बिना मिले शक्ति असंभव !


डूबे दो में, पार हुए जब 

एक में अंतर को विश्राम, 

वही जानता एक हुआ जो 

टुकड़ों में नहीं मिलते राम !

 

शनिवार, जून 5

अम्बर नीला का नीला है

अम्बर नीला का नीला है 


माना दुःख भारी है जग में 

उर आनंद अनंत छुपा है, 

कितने भी तूफां उठते हों 

अंतर हर तूफ़ां से बड़ा है !


मृत्यु हजारों रूप धरे पर 

जीवन पल-पल प्रकट रहा है, 

क्या बिगाड़ पाएगी उसका 

जो स्वयं मरकर पुनः जगा है !


बादल चाहे घटाटोप हों 

अम्बर नीला का नीला है, 

महल दुमहल धराशायी हों 

भूमिकंप से गगन बचा है !


लहरें लाख उठे सागर में 

सागर से वे बड़ी नहीं हैं, 

विपदाएं हर कदम खड़ी हों  

फिर भी पथ पर अड़ी नहीं हैं !


दुःख काल्पनिक हो सकते हैं 

सुख लेकिन उस परम से आता, 

सत्य वही है सदा टिके जो 

गहन नींद में दुःख न सताता !




 

शुक्रवार, अक्टूबर 23

छू पाता है उस अखण्ड को

 छू पाता है उस अखण्ड को

छंद बद्ध हो जीवन अपना 

गीत, सहज संगीत जगेगा,

ऋतु, दिन-रात बंधे ज्यों लय में 

उर  से भी सुर-ताल बहेगा !


सुख-दुःख, राग-विराग भी जैसे 

आरोहण-अवरोहण बनकर, 

श्वासों के संग आ महकेंगे 

रसमय हर अनुभव को रचकर !


नहीं विषाद का इक लघु कण भी 

छू पाता है उस अखण्ड को, 

जिससे शक्ति पाती यह सृष्टि 

भाव विचार का है स्रोत जो !


कभी धूप कभी छाँह सुहाती 

मौसम कैसे बदलें मन के,

बंधा एक चक्र में जीवन 

गगन, चन्द्रमा, सागर, जल में !


बुधवार, अक्टूबर 21

कुछ अपने दिल की बात करो

 कुछ अपने दिल की बात करो 

तुम दूजों की बातें सुनते 

उनके रंग में नहीं रंगो,

कुछ करो शिकायत निज दुःख की 

कुछ अपने दिल की बात करो !


हो अद्वितीय पहचान इसे 

साहस खोजो एकांत चुनो,

निज गरिमा को पहचान जरा 

जग में सुवास बन कर बिखरो !


वह रब हर इक में छुपा हुआ 

जगने की राह सदा देखे, 

जो उगे नितांत तुम्हारे उर  

उन सपनों को साकार करो !


पहले मन को खंगाल जरा 

कुछ हीरे-मोती जमा करो, 

फिर उन्हें चढ़ाकर चरणों में 

निज भावों का आधान करो !


जो गहराई से प्रकटेगा

संगीत वही कोरा होगा, 

यदि रंग किसी का नहीं चढ़े 

वह गीत तुम्हारा ही होगा !


रविवार, अगस्त 30

शिशु और वृद्ध

  शिशु और वृद्ध 

शैशव नहीं जानता दुनियादारी 

वह बेबात ही मुस्कुराता है 

पालने में पड़े-पड़े.. 

और भूखा हो जब पेट तो 

जमीन आसमान एक कर देता है !

उसका रुदन बंटा नहीं है दिल और दिमाग में अभी 

बालक होते-होते बुद्धि सुझाने लगती है 

झूठ और सच का फर्क 

बढ़ती ही जाती हैं दूरियां दिल और दिमाग की 

सीख लेता अपमान या ताड़ना से बचने के लिए 

असत्य का आश्रय लेना 

जन्म होता है फिर पाखंड का 

पर कभी भी सम्भावनाएं मृत नहीं होतीं 

जिन्दा रहता है निर्दोष बचपन 

ताउम्र हरेक के भीतर 

दूरी जितनी बढ़ेगी जिससे 

दुःख उसी अनुपात में बढ़ेगा 

दुखी होने या रहने को 

जब एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है व्यक्ति 

तब गिरना काफी हो गया  

पर कभी न कभी मुक्ति की चाह

अपना सिर उठाती है 

दुःख से मुक्ति, अहंकार से मुक्ति का ही दूसरा नाम है 

और यात्रा यदि जारी रही तो 

लौट आता है बचपन 

एक बार फिर तृप्त जीवन में 

वृद्धावस्था के ! 


सोमवार, अगस्त 10

मन पंकज बन खिल सकता था !


मन पंकज बन खिल सकता था


 

तन कैदी कोई मन कैदी 

कुछ धन के पीछे भाग रहे, 

तन, मन, धन तो बस साधन हैं 

बिरले ही सुन यह जाग रहे !

 

रोगों का आश्रय बना लिया 

तन मंदिर भी बन सकता था, 

जो मुरझा जाता इक पल में  

मन पंकज बन खिल सकता था ! 

 

यदि दूजों का दुःख दूर करे 

वह धन भी पावन कर देता, 

जो जोड़-जोड़ लख खुश होले  

हृदय परिग्रह से भर लेता !

 

जब  विकल भूख से हों लाखों 

 मृत्यू का तांडव खेल चले, 

क्या सोये रहना तब समुचित 

पीड़ा व दुःख हर उर में पले !

 

मुक्ति का स्वाद चखे स्वयं जो  

औरों को ले उस ओर चले, 

इस रंग बदलती दुनिया में 

कब कहाँ किसी का जोर चले !