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मंगलवार, अप्रैल 28

ठहरा मन उपवन प्रशांत है

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 


छायी भीतर नीरव छाया 

 कब बिगाड़ पाती कुछ माया, 

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 

छाया में विमल एकांत है !


उहापोह न शेष रही चाह 

मिली हरियाले वन में राह, 

छल-छल छलकें सोते जल के

बरस मेघ नीर नेह ढलके ! 


 भीतर छायी नीरव  छाया 

 कुछ बिगाड़ पाती कब माया,

मौन मुखर हो उस छाया में 

कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !


 नाद अनोखा अनुपम प्रकाश 

मिल जाये, है जिसकी तलाश, 

थम श्वास मंत्र कोई गाये 

कुदरत का हर रंग लुभाये !



 


 

मंगलवार, जनवरी 21

सारे माला के मनके हैं

सारे माला के मनके हैं


सच के सपने देखा करता 

माया में रमता निशदिन मन, 

जाने किसने बंधन डाले 

मुक्त सदा ही मुरली की धुन ! 


अग्निशिखा सा दिप-दिप करता 

भीतर कोई यज्ञ चल रहा,

दैव एक लिखता जाता है 

लेख कर्म के कौन पढ़ रहा !


शून्य वही जो ब्रह्म कहाये 

एक अनूप  लोक गढ़ता है, 

ख़ुद ही ख़ुद को रहे जानता 

चकित हुआ मन जब तकता है !


है अनंत, अनंत का सब कुछ 

जड़-चेतन दोनों उसके हैं, 

वही बनाये वही चलाये 

सारे माला के मनके हैं !


सोमवार, मार्च 18

गहराई में जा सागर के

गहराई में जा सागर के 


हँसना व हँसाना यारों 

 अपना शौक पुराना है,

आज जिसे देखा खिलते 

कल उसको मुरझाना है !

 

जाने कब से दिल-दुनिया 

ख़ुद के दुश्मन बने हुए, 

बड़े जतन कर के इनको 

तम से हमें जगाना है !

 

बादल नहीं थके अब भी  

कब से पानी टपक रहा ,

आसमान की चादर में 

 हर सुराख़ भरवाना है !


सूख गये पोखर-सरवर  

 दिल धरती का अब भी नम, 

उसके आँचल से लग फिर 

जग की प्यास बुझाना है !


दर्द छुपा सुख  के पीछे  

 संग फूल के ज्यों कंटक, 

किसी तरह  हर बंदे को 

 माया से भरमाना है !


ऊपर ही सोना भीतर 

पीतल, पर उलटा भी है 

गहराई में  सागर के  

सच्चा मोती पाना है !


रविवार, फ़रवरी 26

तू सबब है यहाँ

 
तू सबब है यहाँ

हर घड़ी ख़ास है 

तू मेरे पास है, 

भर रहा नित नयी 

हृदय में आस है !


तुझको देखा नहीं 

पर बता तो सही, 

प्रीत की धार यह 

बिन मिले ही बही !


तू सबब है यहाँ 

जगत सजदा करे, 

हे  माया पति 

रच दे पल में जहाँ, 


कोई जाने नहीं 

तू ही सबमें छिपा, 

खुद को पा कर बँधा 

नित छुड़ा ही रहा !


मन हुआ क़ैद हैं 

अपने ही जाल में, 

कैसे छोड़ेगा तू 

हमें निज हाल में !


इल्म देता हुआ 

सदा रस्ता दिखा, 

ले चले है हमें

 प्यारा रहबर ख़ुदा !

बुधवार, जनवरी 11

कोई कोई ही पहुँचे घर

कोई कोई ही पहुँचे घर


हर सुख की छाया दुःख ही है 

जो संग चली आती उसके, 

हर चाह अचाह छुपाए है 

देखेगा, होश जगे जिसके !


चाहों से यह जग चलता है 

पर टिका हुआ अचाह बल पर, 

मंज़िल दोनों के पार खड़ी 

कोई कोई ही  पहुँचे घर !


जग दो की  फ़िक्र  सदा करता 

आज हँसे कल रोए वाला, 

आख़िर कब तक माया बाँधे 

दे आवाज़ बाँसुरी वाला !


योग अधूरा मन का जब तक 

मानव खुद  को छलता रहता

प्रेम तंतुओं का जो पुतला 

बिरहन सा दुःख सहता रहता !


शुक्रवार, सितंबर 30

पल दो पल की है यह माया

पल दो पल की है यह माया 


यह जो घट रहा मन से जुड़ा  

 हो  घनी धूप चाहे छाया,

व्यर्थ मिटाने का श्रम करता  

केवल पल दो पल की माया !


सत्य मानकर यदि चलेगा  

दुःख के सिवा न कुछ भी मिलता, 

जो बदल रहा पल-पल जग में 

सुख कैसे उससे खिल सकता !


राग-विराग के बिम्ब गढ़ लिए 

उनके प्रतिबिम्बों में खोया, 

उर यह जिस पल हँस सकता था

उन घड़ियों में भी वह रोया !


जो भी मिला वही है काफी 

जब तक न यह तोष जगेगा,

जग का माया जाल सदा ही 

अन्तर की समता हर लेगा !


मंगलवार, सितंबर 27

माया

 माया 

निर्विकल्प होकर ही 

मिला जा सकता है उससे 

जिसे अज्ञानी मिल सकते हैं 

पर जानने का अभिमान रखने वाले नहीं 

जो  बचाए रखता है खुद को

बार-बार दुःख पाता है 

मिलन के उस छोटे से पल में 

मौन का निर्णय भी हमारा नहीं होता 

अस्तित्त्व ही कराता है 

वह तब बरसता है 

जब उसको बरसना है 

हमें बस तैयार रहना है 

उसकी शरण में आना है 

और जहाँ अहंता ही शेष न हो 

तो ममता कैसे टिकेगी 

कैसे बचेगा मोह और आसक्ति 

वह इतना सूक्ष्म है कि वहाँ कुछ ठहर नहीं सकता 

माया में लोटपोट होना हमने ही तय किया 

तो यह हमारा निर्णय हो सकता है 

पर मायापति स्वयं वरण करता है 

जब जानने और होने के मध्य कोई अंतराल नहीं होता 

जो खोया है अब भी विचारों  के जंगल में 

उसने चुना है माया को ! 


शनिवार, सितंबर 24

लहर उठी सागर से कोई

लहर उठी सागर से कोई


​​तू मुझमें ही वास कर रहा

या मैं तेरे घर हूँ आया ?

रहना-आना दोनों मिथ्या  

एक तत्व है कौन पराया !


लहर उठी सागर से कोई 

अगले पल उसमें जा खोयी, 

पल भर का इक नर्तन करके 

निज स्वरूप में जाकर सोयी !


मेरा होना तुझसे ही है 

तू ही मैं बनकर खेले है, 

एक तत्व अखंड  शाश्वत नित 

दिखते जीवन के मेले हैं !


दर्शक बनकर देख रहा तू 

कैसे माया लीला रचती, 

मन खुद  को सर्वस्व समझता   

अंतर को फिर व्याकुल करती !



शुक्रवार, जून 3

गीत समर्पण का

 गीत समर्पण का 

हमारी चाहतों में नहीं था प्यार 

कभी लाघें नहीं मंदिरों के द्वार 

दूर से ही देखते रहे 

लोगों का आना-जाना 

अभी तो हमें था अपनी प्रतिमा को सजाना 

जो भी किया खुद के लिए 

औरों का ख़्याल ही नहीं आता था 

अहंकार का पत्थर सम्मुख खड़ा 

हो जाता था 

अपनी सुविधा देखकर की थी किसी की भलाई 

थोड़ा सा दान देते हुए बड़ी सी तस्वीर भी खिंचवाई 

हमारी ख़ुशी हमारी अपनी बढ़ोतरी में नज़र आती 

यह जगत हमारे लिए ही बना है 

जाने कौन सी माया यह बता जाती थी 

पर कहाँ मिली ख़ुशी, क्योंकि

उसमें प्यार की खुशबू नहीं थी

ख़ुशी प्रकाश की तरह सीधी नहीं मिलती 

परावर्तित होकर अपने भीतर खिलती है 

यह राज किसी के सामने खुलता है 

तो वह पहली बार अस्तित्त्व के सामने झुकता है 

उस समर्पण में ही भीतर कोई द्वार खुलता है 

हवा का एक झोंका सा आकर 

सहला जाता है 

तब देने की ललक जगती है ! 


सोमवार, मई 2

शब्दों के जंगल उग आते

शब्दों के जंगल उग आते


मात्र मौन है जिसकी भाषा

शब्दों से क्या उसे है काम,

अनहद नाद बहे जो निशदिन 

सहज दिलाए परम विश्राम !


कुदरत जड़ अनंत चेतन है 

मेल कहाँ से हो सकता है,

तीजे हम हैं बने साक्षी

कौन हमें फिर ठग सकता है ?


शब्दों के जंगल उग आते

प्रीत, ज्ञान जिसमें खो जाते,

  सुर निजता का भुला ही दिया

माया का इक महल बनाते !


मन शशि सम घटता बढ़ता है 

निज प्रकाश कहाँ उसके पास,

जिसके बिना न सत्ता उसकी

उस चेतन पर नहीं विश्वास !


थम जाये तन ठहरा हो मन

अहंकार को मिले विश्राम,

मेधा विस्मित थमी ठगी सी

झलक दिखायेगा तभी राम !


वही झलक पा मीरा नाची

चैतन्य को वो ही लुभाए,

वही हमारा असली घर है

कबिरा उस की बात सुनाये !




सोमवार, दिसंबर 28

अबूझ है मन

अबूझ है मन 

मुँह लगे सेवक सा कब 
हुकुम चलाने लगता है 
पता ही नहीं चलता 

कभी सपने दिखाता है मनमोहक 

कि आँखें ही चौंधियाँ जाएँ

और कभी आश्वस्त करता है 

पहुँचा ही देगा मंजिल पर 

मन की मानें तो मुश्किल 

मनवाएँ उससे यह उससे भी बड़ी 

बुद्धि भी है थक-हार कर खड़ी 

नींद में दुनिया की सैर कराता है 

जागने पर माया के फेर में पड़वाता है 

मासूम सा बना भजन भी गाता है 

कभी पुरानी गलियों में लौटा ले जाता है 

यह पिंजरे का पंछी 

उड़ना ही भूल गया 

इक आस की सींक पर बैठे-बैठे झूल गया

इसको तो बस देखते भर रहना है 

न भागना इससे, न डराना 

निरपेक्ष होना है 

यह मन भी उसी की माया है 

जिसने यहाँ सभी को जाया  है ! 

रविवार, सितंबर 20

आकाश कब बुलाये

 आकाश कब बुलाये

भूली सी कोई याद

  जाने कब से सोयी है

 हर दिल की गहराई में 

  करती है लाख इशारे जिंदगी

किसी तरह वह याद 

 दिल की सतह पर आये 

युग-युग से  किया विस्मृत जिसे 

बेवजह माया के हाथ पिसे

अब करे कोई क्या उपाय 

कि बिछड़े उस प्रियतम की 

याद आये... 

और उसका विरह सताये 

फिर देह भाव छूटे 

पिंजर मन का टूटे 

थे असीम से छूटे 

सीमा अब न भाए

धरती यही सोचे 

आकाश कब बुलाये !