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सोमवार, मई 12

सरल और तरल

सरल और तरल 


चीजें जैसी हैं, वैसी हैं 

हम उन्हें खींच कर

 बनाना चाहते हैं 

जैसी हम उन्हें देखना चाहते हैं 

यही खिंचाव तो तनाव है 

तनाव भर देता है मन को

 उलझन से 

कर देता है जटिल 

छा जाती है आत्मग्लानि व्यर्थ ही 

चीजें जैसी हैं सुंदर हैं 

मान लें यदि

 कोई मापदंड न बनायें 

कोई निर्णय न दें 

पक्ष या विपक्ष में 

स्वयं को सदा 

सही सिद्ध करने की 

ज़िद छोड़ दें 

तो सारा तनाव घुल जाता है 

मन सरल और तरल होता जाता है 

और आत्मा 

अपने सहज स्वरूप में 

खिली रहती है !

अनायास ही सहज प्रेम  

जो चारों ओर बिखरा है 

हवा और धूप की तरह 

प्रतिबिंबित होने लगता है भीतर से !


रविवार, अप्रैल 15

यदि हम गए होते सारनाथ



जब हम बनारस में थे एक बार सारनाथ जाने का कार्यक्रम बना पर किसी कारण वश सफल नहीं हो पाया तब मैंने यह कविता लिखी थी.

यदि हम गए होते सारनाथ

झड़ गया होता
मन का हल्का सा भी तनाव
हरे पेड़ों की छाँव में,

वह नीला गगन
याद दिलाता अनंत की
और कुलांचे भरते हिरण
कैसी पुलक न भर देते मन प्राणों में

वे ऊँचे स्तूप बने है जिसकी याद में
उसकी सौम्य मूर्ति
भीतर तक एक शांति और ठहराव को जन्म देती
कतारें दीपकों की
अंतर को सुवासित करतीं

यदि हम गए होते सारनाथ....

भूल जाते कुछ पल के लिये
ओढ़ी हुई उपाधियाँ
प्रकृति के सान्निध्य में
बच्चे न बन जाते....