जब हम बनारस में थे एक बार सारनाथ जाने का कार्यक्रम बना पर किसी कारण वश सफल नहीं हो पाया तब मैंने यह कविता लिखी थी.
यदि हम गए होते सारनाथ
झड़ गया होता
मन का हल्का सा भी तनाव
हरे पेड़ों की छाँव में,
वह नीला गगन
याद दिलाता अनंत की
और कुलांचे भरते हिरण
कैसी पुलक न भर देते मन प्राणों में
वे ऊँचे स्तूप बने है जिसकी याद में
उसकी सौम्य मूर्ति
भीतर तक एक शांति और ठहराव को जन्म देती
कतारें दीपकों की
अंतर को सुवासित करतीं
यदि हम गए होते सारनाथ....
भूल जाते कुछ पल के लिये
ओढ़ी हुई उपाधियाँ
प्रकृति के सान्निध्य में
बच्चे न बन जाते....
