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गुरुवार, जून 4

ग्लेशियर पिघल रहे हैं

ग्लेशियर पिघल रहे हैं 



धरती के दोनों ध्रुवों पर पर बसने वाले 

छोटे-छोटे मुल्कों को 

झेलनी पड़ रही है सजा 

उस जुर्म की, जो उन्होंने किया ही नहीं 

हर रोज़ मरते हैं हरित वन 

और जन्मते हैं कंक्रीट के जंगल 

हर रोज़ उगलते हैं करोड़ों वाहन, धुआँ 

एसी, गर्म हवा और चिमनियाँ, आग 

ग्लोबल वार्मिंग का सृजक, शहरी आदमी 

फूँके जा रहा कोयला और तेल बेहिसाब 

कुदरत के प्रति उदासीन 

जब उसका भीषण रूप डराता है 

उसके प्रकोप के आगे 

हर विकास धरा रह जाता है 

टूटते बादल, दरकते पर्वत 

आये दिन छा जाने वाले अंधड़ और तूफ़ान 

आख़िर कब समझेगा इंसान 

जब उसे अपने अस्तित्त्व के लिए 

इसी प्रकृति का आश्रय ही लेना 

तो असजग होकर क्यों जीना ?

 

 

शुक्रवार, दिसंबर 23

अरूप

अरूप


वह जो अरूप है भीतर 

अकारण सुख है 

उसकी मुस्कान थिर है 

चिर बसंत छाया रहता है उसके इर्दगिर्द 

अनहद राग बजता है अहर्निश 

जगत से उपराम हुआ 

कोई उस राम से मिलता है 

किसी-किसी के हृदय में 

उसकी चाहत का फूल खिलता है 

प्रपंच से परे वह समाधि में लीन है 

जैसे हिमालय के शिखर पर शिव आसीन है 

आत्मा के अनन्त सागर में उठने वाली लहरों को ही 

निहारते हैं हम 

जो कहीं नहीं जातीं

व्यर्थ ही सिर टकराती हैं 

भँवर उठते हैं कहीं तूफान 

कहीं बहते चले आते हैं फूल 

कहीं बहाया गया उच्छिष्ट 

अनदेखा ही रह जाता है वह अनूप 

वह जो अरूप है भीतर !