बच्चे
मुस्कानों की खेती करते
स्वयं हँसते औरों को हँसाते
सदा बिखेरें धूप ख़ुशी की
न गम के बादल उन पर डालो !
अपनापन झलके आँखों से
अधरों से विश्वास टपकता,
जैसे रब से डोर बंधी हो
खुले नहीं ये देखो भालो !
पल-पल में उजास बिखराते
अभी स्वच्छ है पट अंतर का
वे जीवन हैं, वे आशा हैं
न भटकें वे, उन्हें संभालो !
जीवन घट रस से भर लाये
छोटे-बड़े का भेद न जानें,
अपना यह, वह कोई दूजा
उनके दिल में भेद न डालो !
स्वप्न वही हैं मानवता के
मित्र हैं ऐसे निकट हृदय के,
नहीं दिखावट नहीं शिकायत
उनकी फ़ितरत सदा संभालो !
