दिल, दौलत और दुनिया
इक्कीसवीं सदी में सभ्य हो गया है आदमी
राजी है वह धन की खातिर
ईमां भी खोने को
बढता रहे बस तिजोरी का रुतबा
इस खातिर वह
नींदे ही नहीं गंवाता
रिश्ते भी गंवाता है.....
भरने को तो एक ही शै
खुदा ने ऐसी बनाई
झुकती है जिसके
सामने खुद उसकी खुदाई
दुनिया की हर दौलत
जिसके सामने शरमाई
मुहब्बत ही वह शै है
जो जितनी लुटाई
उतनी ही बढती है
उसकी कमाई
यह उल्फत की दुनिया
उलट है इस दुनिया से
यहाँ जिसने लुटाया उसने
पाया ही पाया....
कौडियों के मोल बेच इसे
फिर भी यह मानव इतराया....
भेद सृष्टि का जब समझ न पाया....