कौन फूल खिलने से रोके
बहे न दिल से धार प्रीत की
जाने कितने पाहन रोकें,
हरियाली उग सकती थी जब
कौन फूल खिलने से रोके !
सहज स्पंदित भाव क्यों उठते
तर्कों के तट बांध लिए जब,
घुट कर रह जाती जब करुणा
कैसे जगे ख़ुशी भीतर तब !
एक बीज धरती में बोते
बना हजार हमें लौटाती,
इक मुस्कान हृदय से उपजी
अनगिन दिल के शूल मिटाती !
बहना ही होगा मन को नित
अंतर का सब प्यार घोलकर,
भरते रहना होगा घट को
उस अनाम का नाम बोलकर !
उसी एक का प्रेम जगत में
लाखों के अंतर में झलके,
जो दिल इसमें भीग गया हो
पा जाता है खुद को उसमें !
