नया जब दिन उगा
नूतन उच्छ्वास भरें
श्वासों में हर्ष के,
नया सा दिन उगा
वृक्ष पर वर्ष के !
आशा कुम्हलायी जो
बंधी अभी छोर में ?
लिए बासी मन जगे
क्यों कोई भोर में ?
ताजा समीर बहे
क्षमता भी बढ़ी है,
कल से आज तलक
उम्र सीढ़ी चढ़ी है !
जैसा भी हो समय
नया उत्कर्ष हो,
हँसी की गूंज सदा
बीते दिन अमर्ष के !
नया जब दिन उगे
वृक्ष पर वर्ष के !
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