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बुधवार, नवंबर 15

अभी समय है नजर मिलाएं


 अभी समय है नजर मिलाएं


नया वर्ष आने से पहले
नूतन मन का निर्माण करें,
नया जोश, नव बोध भरे उर
नये युग का आह्वान करें !

अभी समय है नजर मिलाएं
स्वयं, स्वयं को जाँचें परखे,
झाड़ सिलवटों को आंचल से
नयी दृष्टि से जग को निरखे !

रंजिश नहीं हो जिस दृष्टि में
नहीं भेद कुछ भले-बुरे का,
निर्मल आज नजर जो आता
कल तक वह धूमिल हो जाता !

पल-पल बदल रही है जगती
नश्वरता को कभी न भूलें,
मन उपवन हो रिक्त भूत से
भावी हित मन माटी जोतें !

कर डालीं थी कल जो भूलें
उनकी जड़ें मिटा दें उर से,
नव पौध प्रज्ञा की उगायें
नव चिंतन से सिंचन कर के !

बने-बनाये राजपथ छोड़
नूतन राहों का सृजन करे,
नया दौर बस आने को है
मन शुभता का ही वरण करे !

मंगलवार, दिसंबर 29

जाता हुआ वर्ष

जाता हुआ वर्ष

वक्त का पहिया आगे कुछ सरक गया
अनगिन सौगात दे और एक बरस गया

दुनिया में युद्ध कहीं शांति की बात हुई
पारा कुछ और चढ़ा भारी बरसात हुई

बदलीं निष्ठाएं कुछ सत्ताए भी छिनीं 
सहनशीलता घटी अफवाहें भी बुनीं

तेवर शीतल हुए मंदी की मार पड़ी
योगमय हुआ विश्व ध्यान की लहर बढ़ी

सीरिया में रक्त बहा बेघर को घर मिला
द्वार खुले ही मिले जहाँ गया काफिला

आई एस का जुल्म बढ़ा दूरियां भी घटीं
समीकरण बने नये मित्रता को शक्ल दी

विष बढ़ा वायु में विकास महंगा पड़ा
जाता हुआ यह बरस दे कई सबक गया 

बुधवार, मई 20

गाँठ सभी खोल लो


गाँठ सभी खोल लो
  

एक वर्ष और बीता
गठरी न बांधो और
जाने कब चलना हो
अंतिम हो कौन भोर ?

हल्का ही मन रहे
सफर जाने कैसा हो,
गाँठ सभी खोल लो
कौड़ी न पैसा हो !

एक ही लगन रहे
जाना है उसी देश,
कोई जहाँ तके राह
भटके बहुत परदेश !

मंगलवार, दिसंबर 24

नया वर्ष आने वाला है




नया वर्ष आने वाला है  

धरती ने की पूर्ण सूर्य की
इक परिक्रमा देखो और,
बीत गयीं कुछ अमावसें व
जगीं पूर्णिमाओं की भोर !

पुनः ली करवट ऋतु चक्र ने
सहज पुकारे है जीवन,
हुई शोख रंगत फूलों की
सुन भ्रमरों की बढ़ती गुंजन !

अनल गगन की नव रश्मि से
हम भी तो भीतर सुलगा लें,
भरकर भीतर नई ऊष्मा
कुहरा मन का छंट जाने दें !

करें पूर्ण जो रहा अधूरा
जो छूटे संग उन्हें ले लें,
धूल सा झाड़ें जो अनचाहा
तज अतीत हल्के हो लें !

उम्मीदों की धूप जगाएं
ख्वाब भरें सूनी आँखों में,
रब ने दी जिन्दगी जिनको
न्याय मांगते पर राहों में !

प्रेम जग दिलों में उनके 
लोभ, स्वार्थ जहाँ है भारी,
नये वर्ष में यही प्रार्थना,
कोई न भूखा, न लाचारी !

नहीं घुले जहर मिट्टी में
हों निर्मल नदियों के जल,
शुद्ध हवाएं, कटें न जंगल
तंग न हो किसी का दिल !

बेवजह गमजदा आदमी
जागे वह खुद को पहचाने,
नहीं गुलामी करे किसी की
आजादी का सुख भी जाने !

एक नयी आस्था भीतर  
जीवन का आधार बने,
जीत सत्य की ही होगी
पुनः यही हुंकार उठे !

भय से नहीं प्रेम से जोड़ें
शुभ संस्कृतियाँ पुनः खिलें,
नया वर्ष आने वाला है  
खुशियों की सौगात मिले !

गुरुवार, जुलाई 4

नया जब दिन उगा

नया जब दिन उगा


नूतन उच्छ्वास भरें
श्वासों में हर्ष के,
नया सा दिन उगा
वृक्ष पर वर्ष के !

आशा कुम्हलायी जो
बंधी अभी छोर में ?
 लिए बासी मन जगे
क्यों कोई भोर में ?

ताजा समीर बहे
क्षमता भी बढ़ी है,
कल से आज तलक
उम्र सीढ़ी चढ़ी है !

जैसा भी हो समय
नया उत्कर्ष हो,
हँसी की गूंज सदा
बीते दिन अमर्ष के !

नया जब दिन उगे  
वृक्ष पर वर्ष के !