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सोमवार, जुलाई 8

अब पुनःरुक्त नहीं होना है

अब पुनःरुक्त नहीं होना है

पूछ रहा है पता ठिकाना
भीतर अपनी याद खो गयी,
उन्हीं रास्तों पर चलता है
खुले नयन, पर दृष्टि सो गयी !

साँझ-सवेरे भी बदलेंगे
बीज अलख का इक बोना है,
सतत् प्रयाण रहे चलता
अब पुनःरुक्त नहीं होना है !

सिंचन प्रतिपल नव कुसुमों का
छिपे हुए जो अभी धरा में,
मानस-भू पाषाण बनी जो  
पिघलेगी ही सघन त्वरा में !

मन से ऊपर, परे भाव से
इक जोगी वाला डेरा है,
वहाँ न श्याम रात का साया
हर पल ही नया सवेरा है !