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गुरुवार, अगस्त 6

माँ और मानव

माँ और मानव  

प्रेम और ज्ञान के तन्तुओं से 

बनी माँ शारदे 

शांति और सुख से भरी

शक्ति अपार धारे 

माँ दुर्गा 

निमग्न आनंद में 

बगिया सी हरी

पुनीता लक्ष्मी ! 


उत्साह कण-कण में समोये 

उदार व तृप्त सदा 

सृजनशील, अभय देती   

कृतज्ञ और सजग 

फूल सी खिली 

ईश्वरी ! 


उनकी ओर हो अपना प्रयाण 

जानें उन्हें और पाएँ वरदान 

मानव ह्रदय की 

यही तो उपलब्धि है 

अंतर में अभाव नहीं 

पूर्ण समृद्धि है !

 


सोमवार, जुलाई 8

अब पुनःरुक्त नहीं होना है

अब पुनःरुक्त नहीं होना है

पूछ रहा है पता ठिकाना
भीतर अपनी याद खो गयी,
उन्हीं रास्तों पर चलता है
खुले नयन, पर दृष्टि सो गयी !

साँझ-सवेरे भी बदलेंगे
बीज अलख का इक बोना है,
सतत् प्रयाण रहे चलता
अब पुनःरुक्त नहीं होना है !

सिंचन प्रतिपल नव कुसुमों का
छिपे हुए जो अभी धरा में,
मानस-भू पाषाण बनी जो  
पिघलेगी ही सघन त्वरा में !

मन से ऊपर, परे भाव से
इक जोगी वाला डेरा है,
वहाँ न श्याम रात का साया
हर पल ही नया सवेरा है !


बुधवार, जुलाई 3

एक विजय प्रयाण चल रहा

एक विजय प्रयाण चल रहा


एक विजय प्रयाण चल रहा
हर क्षण इक संग्राम चल रहा,
भेदन, शोधन, संवर्धन का
प्रतिपल इक अभियान चल रहा !

गहन गुफाओं से अंतर की
धाराएँ ऊपर उठती हैं,
सौम्य भाव बहे अम्बर से
संग मेघ रूप धरती हैं !

इक सागर ज्योति का जिस पर  
गहन आवरण अन्धकार का,  
एक परम ऊर्जा सोयी  
इक आनंद है महाकार सा !

कोई अविरत सदा जगाता  
चरैवेति का मंत्र सुनाता,  
दुख दानव बलशाली कितना  
सुख देव की विजय कराता !  

प्रतिपल कोई साथ हमारे
सिर पर हाथ धरे है चलता,
विजय सत्य की ही होती है
स्वपन अगन सा जलता रहता !

दिव्य लोक से आवाह्न इक
अभीप्सा सत्य की जगाये,
आरोहण करने की प्रेरणा
निर्मल मन में भरती जाये !