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रविवार, अप्रैल 18

श्वासें

श्वासें 


गा रही हैं नाम  

जिसे हम सुन नहीं पाते 

या कर देते हैं सुनकर भी अनसुना 

श्वासें कीमती हैं कितनी 

यह बात सिखा रहा है एक वायरस आज 

चेतना के समंदर में उठती-गिरती लहरों सी 

ही तो हैं ये श्वासें 

उथली और छोटी होंगी तो 

नाप नहीं पाएंगी गहराई उसकी 

तीव्र और कंपित होंगी 

तो मन को भयभीत बनाएंगी 

गहरा करें इन्हें 

उस परम की ऊर्जा भरें उनमें 

यही प्राणों का आयाम हमें मुक्त करता है

 भर देती हैं शक्ति से जब भीतर आती हैं 

बाहर जाती हुई समर्पित हो जाती हैं 

‘सो’ कहकर चेतना को भरतीं 

‘हम’ में स्वयं को अर्पित करतीं 

इन्हीं श्वासों का आवागमन ही जीवन है 

इनसे ही चलता मन है 

श्वासें हल्की और धीमी हो जाएँ 

एक लय में पिरो ली जाएँ 

तो टिक जाता है मन का अश्व भी  

और चैतन्य उसमें झलक जाता है ! 


 

शनिवार, दिसंबर 7

वही सदा मुक्त है


वही सदा मुक्त है

जो भी सुना है
जो भी अनसुना रह गया है
जो भी जाना है
जो भी अजाना रह गया है
जो भी कहा है
जो भी अनकहा रह गया है
जो भी लखा है
जो भी अदेखा रह गया है
वह इन सबसे जुदा है
वही खुदा है !

जो मंदिर में भी है
जो मंदिर में ही नहीं है
जो मस्जिद में भी है
जो मस्जिद में ही नहीं है
जो गिरजे में भी है
जो गिरजे में ही नहीं है
जो गुरुद्वार में  है
गुरुद्वार में ही नहीं है
वही तो सब तरफ है
वही परम है !

जो कल भी था
जो कल भी रहेगा
जो आज भी है
आज के बाद भी रहेगा
जो समय से पूर्व था
समय के बाद भी रहेगा
वह कालातीत है
वही प्रीत है !

जो अति सूक्ष्म है
जो अति विशाल है
जो निकटस्थ है
जो सबसे दूर है
जो अनंत है
वही परम् आनंद है !

जो आँखों से दिखाता है
नजर नहीं आता है
जो कानों से सुनाता है
सुना नहीं जाता है
जो मन से लुभाता है
नींदों में सुलाता है
जो नित्य जाग्रत है
वही सदा मुक्त है !