श्वासें
गा रही हैं नाम
जिसे हम सुन नहीं पाते
या कर देते हैं सुनकर भी अनसुना
श्वासें कीमती हैं कितनी
यह बात सिखा रहा है एक वायरस आज
चेतना के समंदर में उठती-गिरती लहरों सी
ही तो हैं ये श्वासें
उथली और छोटी होंगी तो
नाप नहीं पाएंगी गहराई उसकी
तीव्र और कंपित होंगी
तो मन को भयभीत बनाएंगी
गहरा करें इन्हें
उस परम की ऊर्जा भरें उनमें
यही प्राणों का आयाम हमें मुक्त करता है
भर देती हैं शक्ति से जब भीतर आती हैं
बाहर जाती हुई समर्पित हो जाती हैं
‘सो’ कहकर चेतना को भरतीं
‘हम’ में स्वयं को अर्पित करतीं
इन्हीं श्वासों का आवागमन ही जीवन है
इनसे ही चलता मन है
श्वासें हल्की और धीमी हो जाएँ
एक लय में पिरो ली जाएँ
तो टिक जाता है मन का अश्व भी
और चैतन्य उसमें झलक जाता है !

