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मंगलवार, नवंबर 11

जीवन राग


जीवन राग 

मिट जाते हैं सारे द्वन्द्व 

झर जाता है हर विरोध 

ख़त्म हो जाता है सदा के लिए संघर्ष 

जब नत मस्तक होता है मन (तेरे सम्मुख)

खो जाती है हर चाह 

विलीन हो जाती है जगत की कामना 

तुष्टि, पुष्टि और संतुष्टि भी 

खिलौनों सी प्रतीत होती है 

तब कर्मबंधन नहीं बंधता 

जीवन राग बन जाता है ! 


पात्र 

ऋषि मंत्रों के द्रष्टा थे 

देखते थे, देख लेते थे 

अस्तित्त्व में छुपे विचारों को 

सारा ज्ञान सिंचित है कहीं 

बस उसे उजागर करना है 

जैसे जल बहुत है कूप में 

उसे पात्र में भरना है 

हम कब और कैसे पात्र बनें 

यही तय करना है ! 

बुधवार, जुलाई 11

नहीं तो...


नहीं तो...


देह नहीं हो सकता वह
क्योंकि देह उसकी अस्वस्थ है
पर वह पूर्ववत् है
मन भी नहीं क्योंकि मन उसका उदास भी हो सकता है
पर वह खिला रहता है भीतर पूर्ववत्
वह खुद का पता जानने जाता है जब भीतर
एक सन्नाटा ही हाथ आता है
वहाँ कोई नहीं मिलता
कोई नहीं ऐसा जिसे कुछ कहा जा सके
जिसके साथ कुछ किया जा सके....
जो बस है
और जिसके इर्द गिर्द तानाबाना बुना गया है
देह व मन का
जो रहेगा तब भी
जब यह ताना-बना छिन्न भिन्न हो जायेगा
जब मन के कटोरे में देखता है
तो वही मान बैठता है खुद को
कभी देह के पात्र में वही
अभी उसने खुद के दर्पण में खुद को देखा ही नहीं
नहीं तो....



सोमवार, मार्च 5

अमृत बन कर तू ढलता है



अमृत बन कर तू ढलता है


तुझसे परिचय होना भर है
कदम-कदम पर तू मिलता है,
उर का मंथन कर जो पाले
परम प्रेम से मन खिलता है !

भीतर के उजियाले में ही
सत्य शाश्वत झलक दिखाता,
कण-कण में फिर नजर तू आये
श्वास-श्वास में भीतर आता !

पहले आँसू जग हेतु थे
अब तुझ पर अर्पित होते हैं
अंतर पुष्प अश्रु माल बन  
अंतर के तम को धोते हैं !

पात्र यदि मन बन पाए तो
अमृत बन कर तू ढलता है,
हो अर्पित यदि हृदय पतंगा
ज्योति बन कर तू जलता है !

शुभ संकल्प उठें जब मन में
भीतर इन्द्रधनुष उगते हैं,
सुंदरता भी शरमा जाये
ऐसे सहस्र कमल खिलते हैं !