अरबों-खरबों आकाशगंगाएं हैं अपार
और न जाने कितनी पृथ्वियाँ होंगी
कितने सौर मण्डल
जानते हैं इस ब्रह्मांड के बारे में कितना कम
ब्रह्मांड को छोड़ें तो इस पिंड से भी
कितने अनभिज्ञ हैं हम
जैसे जल में मीन
वैसे हवा में यह तन
प्राण ऊर्जा जो इस देह को चलाती है
श्वास के माध्यम से भी भीतर आती है
शक्ति से भरती है
भोजन को पचाती
रक्त को गति देती है
देह टिकी है जिस पर
पर आज एक विषाणु ने रोक दिया है
उसका निर्बाध विचरण
फिर भी याद रहे
ऊर्जा शाश्वत है विषाणु नश्वर
उसे हराया जा सकता है
भय को त्याग कर
स्वयं को सशक्त बनाया जा सकता है
एक न एक दिन मानवता उससे मुक्ति पा ही लेगी
उस दिन फिर से गूंजेगी स्कूलों में बच्चों की आवाजें
और उनके गीतों से फिजा महकेगी !

