तेरे सिवा कोई और कहाँ है
बन जाऊँ मैं तेरी बांसुरी
तेरे गीतों को जन्माऊँ,
तू ही झलक-झलक जाये फिर
मन दर्पण को यूँ चमकाऊँ !
प्रस्तर में ज्यों छिपी मूर्ति
शिल्पी की आँखें लख लेतीं,
इस महा अस्तित्त्व में कान्हा
निरख-निरख शुभ दर्शन पाऊँ !
कण-कण में जो गूंज रहा सुर
उर में ही झंकृत कर पाऊँ,
हवा, धूप, आकाश, अनल सा
निकट सदा पा तुझको ध्याऊँ !
‘मैं’ ही जो ‘मैं’ जो भीतर रहता
ढक पुष्पों से उसे चढाऊँ,
ज्यों जल भरता खाली घट में
अंतर्मन में तुझे समाऊँ !
तेरे सिवा कोई और कहाँ है
माया कह कर किसे बुलाऊँ,
तू ही भीतर तू ही बाहर
लख-लख यह लीला मुस्काऊँ !
एक तत्व से हुआ पसारा
एक उसी को सदा रिझाऊं,
‘तू’ ही ‘मैं’ बन खोज रहा है
अद्भुत भेद समझ न पाऊं !