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शुक्रवार, अगस्त 29

बादल है तो बरसेगा ही

बादल है तो बरसेगा ही 


बादल है तो बरसेगा ही 

खेत किसी का सरसेगा ही, 

भरा हुआ है जो अभाव से 

ऐसा मन तो तरसेगा ही !


जल अध गगरी छलकेगा ही 

व्यर्थ हुआ सा ढलकेगा ही, 

आत्ममुग्धता में जो सिमटा 

कदम-कदम पर ठिठकेगा ही !


यौवन इक दिन बीतेगा ही 

ताक़त का घट रीतेगा ही, 

कायाकल्प करा लो जितना 

काल देवता जीतेगा ही !


सोया है जो जागेगा ही 

सपनों में भी भागेगा ही, 

कब तलक बचा-बचा रखोगे 

चोर गठरिया लागेगा ही !


शनिवार, जून 5

अम्बर नीला का नीला है

अम्बर नीला का नीला है 


माना दुःख भारी है जग में 

उर आनंद अनंत छुपा है, 

कितने भी तूफां उठते हों 

अंतर हर तूफ़ां से बड़ा है !


मृत्यु हजारों रूप धरे पर 

जीवन पल-पल प्रकट रहा है, 

क्या बिगाड़ पाएगी उसका 

जो स्वयं मरकर पुनः जगा है !


बादल चाहे घटाटोप हों 

अम्बर नीला का नीला है, 

महल दुमहल धराशायी हों 

भूमिकंप से गगन बचा है !


लहरें लाख उठे सागर में 

सागर से वे बड़ी नहीं हैं, 

विपदाएं हर कदम खड़ी हों  

फिर भी पथ पर अड़ी नहीं हैं !


दुःख काल्पनिक हो सकते हैं 

सुख लेकिन उस परम से आता, 

सत्य वही है सदा टिके जो 

गहन नींद में दुःख न सताता !




 

मंगलवार, जनवरी 12

सब कुछ उसमें वह सबमें है

सब कुछ उसमें वह सबमें है
झर-झर बरस रहा है बादल 
भर ले कोई खोले आँचल, 
सिक्त हुआ आलम जब सारा 
क्यों प्यासा है मन यह पागल !

सर-सर बहता पवन सुहाना 
जैसे गाये मधुर तराना, 
लहराते अरण्य प्रांतर जब
 पढ़ता क्यों दिल गमे फ़साना !

चमक दामिनी दमके अंबर
प्रकटा क्षण में भीतर-बाहर, 
हुआ दीप्त जब कण-कण भू का 
अंधकार में क्यों डूबा उर !

मह-मह गन्ध लुटाता उपवन 
सुख-सौरभ से भर जाता वन, 
हुई सुवासित सभी दिशाएं 
कुम्हलाया सा क्यों व्याकुल बन !

जर्रे-जर्रे बसा आकाश 
दूर नहीं वह हृदय के पास, 
सब कुछ उसमें वह सबमें है 
फिर क्यों कहे मिल जाये काश ! 
 

मंगलवार, दिसंबर 2

शांत झील के दर्पण पर

शांत झील के दर्पण पर



जैसे कोई फूलों वाली
डाल अचानक झर जाए,
या फिर तपती भू पर बादल
बरबस यूँ ही बरस जाए !

हो निस्तब्ध रात्रि बेला
बिखरी हो ज्योत्स्ना मधुरिम,
शांत झील के दर्पण पर या
सोया हो पंकज रक्तिम !

नील गगन में ओढ़े बदली
लुक-छुप नाज दिखाए चंदा,
भोर अभी होने को ही हो
पंछी का हो स्वर मंदा !

वैसा ही उसका आना है
बरसों जिसे पुकारा पाहुन,
उर उपवन दिप-दिप कर झूमे   
मदमाता मन का प्रांगण !

शुक्रवार, नवंबर 21

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण



हर मिलन अधूरा ही रहता
हर उत्सव फीका लगता है,
कितना ही भरना चाहा हो
तुझ बिन घट रीता लगता है !

ज्यों बरस-बरस खाली बादल
चुपचाप गगन में खो जाते,
कह-सुन जीवन भर हम मानव
इक गहन नींद में सो जाते !

कितनीं मनहर शामें देखीं
कितनी भोरों को मन चहके,
सूनापन घिर-घिर आता फिर
कितने हों वन –उपवन महके !

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण
पर नजर नहीं वह आता है,
जाने किस लोक का वासी है
जाने किस सुर में गाता है !

पलकें हो जाती हैं भारी
नीदों में स्वप्न जगाते हैं,
इक भ्रम सा होता मिलने का
जब भोर जगे मुस्काते हैं !