चलना है बहुत पर पहुँचना कहीं
नहीं
किताबे-जिंदगी में आखिरी
पन्ना ही नहीं
घर जिसे माना निकला पड़ाव भर
सितारों से आगे भी है एक
नगर
दिया हाथ में ले चलना है
सफर पर
साथ नहीं कोई न कोई फिकर कर
जुबां नहीं खोलता वह चुप ही
रहता है
रौशनी का दरिया खामोश बहता
है
बिन बदली बरखा बिन बाती
दीपक जलता
कहा न जाये वर्तन कभी न वह
सूरज ढलता
