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बुधवार, मई 28

चुनाव हमारा है




चुनाव हमारा है

कल हम हो जायेंगे विदा 
और परसों 
लोग हमें भूल जायेंगे  
इस तरह 
जैसे कि कभी था ही नहीं 
अस्तित्त्व हमारा
इस दुनिया में 
हमारे हाथ में है ‘आज’ 
चाहे तो गीत गुनगुना लें
या उस अहंकार को सजा लें
जो है ही नहीं।।
उसके कारण अपने पावों में
काँटों को चुभा लें 
या दी है जिसने जिन्दगी की नेमत 
उस रब को रिझा लें !

बुधवार, नवंबर 23

उस भली सी इक ललक को

उस भली सी इक ललक को

   

जिस घड़ी आ जाये होश 

जिंदगी से रूबरू हों,

उसी पल में ठहर कर फिर 

 झांक लें खुद के नयन में !


बह रही जो खिलखिलाती 

गुनगुनाती धार नदिया,

चंद बूँदें ही उड़ेलें 

उस जहाँ की झलक पालें !


क्या यहाँ करना क्या पाना 

यह सिखावन चल रही है,

बस जरा हम जाग देखें 

और अपने कान धर लें !


नहीं माँगे सदा देती

 नेमतें अपनी लुटाती,

चेत कर इतना तो हो कि 

फ़टे दामन ही सिला लें !


पूर्णता की चाह जागे 

लगन से हर राह मिलती,

ला दिया जिसने सवेरा 

रात जिससे रोज खिलती !


उस भली सी इक ललक को

 धूप, पानी, खाद दे दें,

जो कभी बुझती नहीं है

 वह नशीली आग भर लें !


 

शनिवार, जुलाई 3

दिल को अपने क्यों नहीं राधा करें

दिल को अपने क्यों नहीं राधा करें


जिंदगी ने नेमतें दी हैं हजारों 

आज उसका शुक्रिया दिल से करें, 

चंद लम्हे ही सदा हैं पास अपने 

क्यों न इनसे गीत खुशियों के झरें !


दिल खुदा का आशियाना है सदा से 

ठहर उसमें दर्द हर रुखसत करें, 

आसमां हो छत धरा आंगन बने 

इस तरह जीने का भी जज्बा भरें !


वह बरसता हर घड़ी जब प्रीत बन 

मन को अपने क्यों नहीं राधा करें, 

दूर जाना भी, बुलाना भी नहीं 

दिल के भीतर साँवरे नर्तन करें !


झुक गया यह सिर जहाँ भी सजदे में 

वह वही है, क्यों उसे ढूंढा  करें, 

मांगना है जो भी उससे माँग लें 

मांगने में भी भला क्यों दिल डरें !


उर खिलेगा जब उठेगी चाह उसकी 

फूल बगिया में अनेकों नित खिलें, 

शब्द का क्या काम जब दिल हो खुला 

भाव उड़के सुरभि सम महका करें !

 

सोमवार, मई 3

टूटते ख्वाब


टूटते ख्वाब


महसूस करें तो दुख बहुत है बाहर 

भीतर कुछ और क्यों बनाया जाए 


गुजर जाएगा वक्त ही है आखिर यह 

बुरा कहकर क्यों खुद को सताया जाए 


लगा हुआ है हर शख्स अपनी कुव्वत से 

कैसे वायरस को जिस्म से भगाया जाए 


दम तोड़तीं श्वासें कभी जलती हुईं देहें 

किस-किस मंजर से ध्यान अपना हटाया जाए 


बहुत बेमुरव्वत है जिंदगी सुना तो था 

छोटे बच्चों को कैसे यकीं दिलाया जाए 


टूटते ख्वाबों  को देखा है हर किसी  ने  

टूटती साँसों को किस तरह बचाया जाए 


खत्म होगी दुनिया कभी किताबों में पढ़ा था 

कतरा-कतरा क्यों इसका वजूद मिटाया जाए 

 

मंगलवार, अप्रैल 20

मत लगाना दिल यहां पर

मत लगाना दिल यहां पर 


ख्वाब है यह जिंदगी इक 

यह सुना है,

मत लगाना दिल यहां पर 

यह गुना है !


आएगी इक बाढ़ जैसी 

महामारी, 

था अंदेशा कुछ दिलों को 

त्रास भारी !


डोलती है मौत या फिर  

भ्रम हुआ है, 

व्यर्थ ही तो ज्यों सभी का 

श्रम हुआ है !


क्या करेंगे कल यहां 

सूझे नहीं, 

कब थमेगी आग यह 

बूझे नहीं !


जो हो रहा वह मान लें 

हों कैद सब, 

जो पल मिले जी लें उन्हें 

दे चैन रब !


 

सोमवार, अप्रैल 19

ज्यों धूप और पानी


ज्यों धूप और पानी


 

दिल में लरजता जो है 

 रग-रग में कम्प भरता,  

वह भिगो रहा अहर्निश 

जो लौ को ओट देता !


सम्भालता सदा है 

पल भर न साथ छोड़े, 

वह जिंदगी का मानी

धड़कन वही है तन में !


बरसता वही हर सूं

वह चाँद बन चमकता, 

गर ढूंढना उसे चाहें 

कोई पता ना देता !


ऐसे वह बंट रहा है 

ज्यों धूप और पानी, 

छुपा नहीं कहीं भी 

नजर आये न हैरानी ! 


महसूस करे कोई 

एक पल भी न बिसरता,  

जिसे पाके कुछ न चाहा

वैसा न कोई  दूजा  !


गर मिल गया किसी को 

कुछ और न वह मांगे, 

उसके ही संग सोये 

संग सुबह रोज जागे !


उसे क्या कोई कहेगा 

वह शून्य है या पूरा, 

हर होश वह भुला दे 

कोई जान न सकेगा !


उसे भूलना न सम्भव 

अनोखा निगेहबां हैं, 

मधुरिम वह स्वप्न देता 

हर दिल में आ बसा है !

 

रविवार, जनवरी 24

हवा का सागर

हवा का सागर 

हवा की सरगोशियाँ गर कोई सुन सके

 पल भर भी तन्हा छोड़ती न रब हो जैसे 

लिपट जाती परस उसका फूल जैसा 

जिंदगी को राह देती श्वास बनकर 

झूमते वट, वृक्ष, जंगल, लता, पादप, फूल सारे 

लहर दरिया, सिंधु के तन पर उठाती

सरसराती सी कभी कानों को छूले 

सुनो ! कहती मत कहो, तुम हो अकेले ! 

वह संदेशे ही सुनाए, राज खोले उस पिया का 

डोलते पंछी से पूछो तैरता क्यों वह हवा में 

मीन जैसे जल में निशदिन वास करती 

जी रहे हैं चैन से हम सागरों में ही हवा के ! 



 

मंगलवार, जुलाई 7

जिंदगी खुद राज अपने

जिंदगी खुद राज अपने 

व्यर्थ जो भी छूट जाये 
सार्थक हृदय को लुभाये, 
जिंदगी खुद राज अपने 
खोल मंजिल पर बिठाये !

बस यही इक प्रार्थना हो
मौन गीतों में गुजाएँ, 
चाह का हर बीज जलकर 
रिक्त हो मन गुनगुनाये !

जो तुम्हारी कामना हो 
हाथ से वह कर्म हो अब, 
जो नचाता था अभी तक 
हुक्म मन तेरा बजाए !

विमल गंगा बन बहा है 
ज्ञान गीता का कहा है, 
धर्म तुझसे पल रहा है 
सत्य का यह ध्वज बताये !

गुरुवार, अप्रैल 23

घर पर ही रहें

घर पर ही रहें


जिंदगी गणित के सूत्रों से नहीं चलती 
एक छोटा सा वायरस 
जो छुपा है एक आदमी में 
अनेक आदमियों में फैल सकता है 
एक वायरस... 
सारे गणित को फेल कर रहा है 
जो ग्रस लेता है 
पूरे परिवार को देखते-देखते 
वायरस ने आपको छुआ है या आपने उसे 
पता भी नहीं चलने देता 
आप मुस्कुराते-मुस्कुराते मिल लेते हैं चंद लोगों से 
या रख देते हैं अपना रुमाल मेज पर 
जो बन चुका है जैविक हथियार 
अनजाने में जो भी उठाएगा 
वह भी धोखे में आ जायेगा 
एक दिन आपका माथा तपता है 
आप अस्पताल चले जाते हैं 
वहां भी यदि नही रहे सचेत तो
सरक जाते हैं कुछ वायरस स्वास्थ्य कर्मी या नर्स पर 
... या कभी डॉक्टर पर 
अनजाने में आप बन चुके हैं वाहक 
भगवान न करे कभी ऐसा घटे  
इसीलिए घर पर ही रहें  ! 

शनिवार, नवंबर 23

जिंदगी


जिंदगी 


जिस घड़ी आ जाये होश जिंदगी से रूबरू हों
एक पल में ठहर कर फिर  झांक लें खुद के नयन में
बह रही जो खिलखिलाती गुनगुनाती धार नदिया
चंद बूंदें ही उड़ेलें उस जहाँ की झलक पालें

क्या यहाँ करना क्या पाना यह सिखावन चल रही है 
बस जरा हम जाग देखें और अपने कान धर लें
नहीं चाहे सदा देती नेमतें अपनी लुटाती
चेत कर इतना तो हो कि फ़टे दामन ही सिला लें

पूर्णता की चाह जागे मनस से हर राह मिलती
ला दिया जिसने सवेरा रात जिससे रोज खिलती
उस भली सी इक ललक को धूप, पानी, खाद दे दें
जो कभी बुझती नहीं है वह नशीली आग भर लें

बुधवार, अगस्त 28

आस्था का दीप दिल में


आस्था का दीप दिल में


कुछ नहीं है पास अपने
रिक्त है मन का समन्दर
मौन की इक गूंज है या
एक शुभ निर्वाण का स्वर

नीलिमा आकाश की भी
एक भ्रम से नहीं ज्यादा
बह रहा जो पवन अविरत
उसी ने यह जाल बाँधा

श्वास की डोरी में खिंच
चेतना का हंस आया
जाल कैसा बुन दिया इक
रचे जाता अजब माया

जिंदगी के नाम पर बस
एक सपना चल रहा है
ओढ़ कर नित नव मुखौटे
स्वयं को ही छल रहा है

भेज देता वह अजाना
एक स्मित इक हास कोमल
जो छुपा है खेल रच के
भर रहा है परस निर्मल

डोलती है धरा कब से
रात-दिन यूँ ही सँवरते
पंछियों के स्वर अनूठे
रंग अनजाने बिखरते

कौन जाने कब जला था
आस्था का दीप दिल में
या कि उसकी लपट यूँ ही
खो गयी थी बेखुदी में

बुधवार, मार्च 28

एक नगमा जिन्दगी का


एक नगमा जिन्दगी का


एक दरिया या समन्दर
बह रहा जो प्रीत बनकर,
बाँध मत बाँधें तटों पर
उमग जाये छलछलाकर !

एक प्यारी सी हँसी भी
कैद है जो कन्दरा में,
कसमसाती खुदबुदाती
बिखर जाएगी जहाँ में !

एक नगमा जिन्दगी का
शायराना इक फसाना,
दिलोबगिया में दबा जो
बीज महके बन तराना !

एक जागी रात आये
ख्वाब नयनों में सजाये,
दूर से आती सदा को
ला निकट कुहु गीत गाये !

एक नर्तन आत्मा का
ढोल की थापें अनूठी,
बाल दे अनुपम उजाला
बाँसुरी, वीणा की ज्योति