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सोमवार, अगस्त 26

काश्मीर की बर्फीली चोटियों पर

काश्मीर की बर्फीली चोटियों पर  

उन्होंने रक्त बहाया
अंतिम बूंद तक
ताकि सलामत रहे देश...
 भटके मीलों पैदल रह भूखे
वज्र बनाया अस्थियों को
भीगे शोलों की वर्षा में
 तपन समोई भीतर अपने
ताकि भारत, भारत रहे...
व्यर्थ न हो यह उनका बलिदान
बर्फीले रस्तों पर घट रहा है जो
सम्भवतः नया वीर जन्मता होगा
 उसी क्षण में ही
जब मरता होगा सैनिक कोई !
सदा सीने पर खायी गोलियाँ
नहीं दिखाई किसी ने पीठ
बढ़ते ही गये एक लक्ष्य लेकर
चढ़ते ही गये न रुके कदम कभी उनके
ताकि मरण सार्थक बने 

शुक्रवार, दिसंबर 21

जहाँ नारी का अपमान होता है....



जहाँ नारी का होता है अपमान

जैसे क्रूस पर चढ़ा हो कोई मसीहा
औरों के लिए..
माथे पर काँटों का मुकुट धारे
जिससे टपकती हो रक्त की धारा
हाथों-पैरों में चुभोये गए नश्तर...

व्यर्थ नहीं जायेगा उसका बलिदान भी
जूझ रही जो अस्पताल के कमरे में
बचायेगी हजारों मासूमों को
 उसकी यह पीड़ा
बहरों के कानों के लिए बनी बम
सोते हुओं को जगाने के लिए
काली की चीत्कार...
मांगती है इंसाफ
उसके लहू की हर बूंद
न सिर्फ खुद पर हुए जो अनाचार  
वरन हर वह पुकार  
जो घुट कर रह गयी होगी
दरिंदों के सामने..

बस अब और नहीं..
वह बनी है मिसाल
सहकर जख्म जिस्मोरूह पर..
चढ़ी है सूली पर
 ताकि चैन से जी सकें
भारत की नारियां...
वरना कहता ही रहेगा 
हर नारी का आत्म सम्मान
नहीं आना उस देश में
जहाँ नारी का होता है अपमान...