इतिहास बार-बार दोहराता है स्वयं को
मंदिर तोड़े जा रहे हैं
खंडित हो रही हैं मूर्तियाँ
धर्म के नाम पर अत्याचार और हैवानियत का
एक बार फिर प्रदर्शन है
जाने यह कैसा विचित्र दर्शन है
जिसमें दूरियाँ पाटी नहीं जा सकीं
शताब्दियों में भी
एक अंधी मानसिकता पनप रही है
जो असहिष्णु तो है ही
मान लिया लिया है जिसने स्वयं को श्रेष्ठ
जो धर्म आदमी में ख़ुदा नहीं देख पाता
वह कैसे राह दिखाएगा
अबोध भेड़ों की तरह जिधर चाहे कोई भी
हांकता हुआ ले जाता है
जियो और जीने दो का मंत्र नहीं आता जिसे
देखें, वह कब तक स्वयं को बचा पाता है !


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