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शुक्रवार, जून 12

भुला दिया है

भुला दिया है 


देह एक नाव है 

मुझ नदी में तैरती हुई 

जो अनंत काल से, अनंत देश के पार बह रही है 

मैं नाव नहीं हूँ,  

 नदी हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


देह एक घर है 

मुझ विदेह के लिए 

जो अनंत काल से, अनंत देश के पार शून्य है 

मैं देह नहीं हूँ 

विदेह हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


देह एक दीपक है 

प्राण स्नेह है जिसमें 

मन बाती और मैं ज्योति हूँ 

जो जो अनंत काल से, अनंत देश के पार दिप-दिप करती है 

मैं दीपक नहीं हूँ 

ज्योति हूँ, पर यह भुला दिया है ! 


शुक्रवार, अगस्त 4

ख़ुद को ही

ख़ुद को ही 


कोई ओट दे देगा 

उढ़का देगा बाती 

या तेल भर देगा दीपक में 

पर जलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !

 

कोई मार्ग दिखा देगा 

लक्ष्य की पहचान दे देगा 

या पाथेय भी दे देगा 

पर चलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई और नहीं उठा सकता 

किसी के काँधे का बोझ 

न ही उतार सकता है 

क्योंकि गहन है कर्म की गति 

अदृश्य है वह भार 

स्वयं ही उतारना है 

हल्का होना है 

क्योंकि उड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


कोई पता बता देगा घर का 

यदि भूल गया है मन 

भटकते हुए इस चक्रव्यूह  में 

उसकी याद दिला देगा 

पर मुड़ना तो ख़ुद को ही पड़ता है !


शुक्रवार, जून 10

भीतर जो भी भाव सृजन के

भीतर जो भी भाव सृजन के 

जलकर बाती तम हरती है 

कवि ! तू अपनी ज्योति प्रखर कर, 

अँधियारा घिर आया जग में 

तज प्रमाद निज दृष्टि उधर कर !


श्रम से स्वेद बहे जो जग में 

 फूल खिलाता वही वनों में,

तिल-तिल कर जलता जब सूरज 

उजियारा छाता इस जग में !


भीतर जो भी भाव सृजन के 

अकुलाहट की आह जो जगी, 

जीवन पथ निर्विघ्न बनाए

वही बनेगी क्षमता उर की !


शनिवार, जुलाई 15

उन अँधेरों से डरें क्यों

उन अँधेरों से डरें क्यों


खो गया है घर में कोई चलो उसे ढूँढ़ते हैं
बह रही जो मन की सरिता बांध कोई बाँधते हैं

आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें 
उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं

इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास अपने
उन अँधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता खोजते हैं

हँसे पल में पल में रोए मन शिशु से कम नहीं है
दूर हट के उस नादां की हरकतें हम देखते हैं

कुछ नहीं है पास खुद के बाँस जैसी खोखली जो
उस अकड़ को शान से चेहरे बदलते देखते हैं  

सोमवार, मई 27

इक दिया, कुछ तेल, बाती


इक दिया, कुछ तेल, बाती



खो गया है कोई घर में चलो उसको ढूँढ़ते हैं
बह रहा जो मन कहीं भी बांध कोई बाँधते हैं

आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें  
उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं

इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास हैं
उन अंधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता खोजते हैं

हँस दे पल में पल में रोए मन शिशु से कम नहीं
दूर हट के उस नादां की हरकतें हम देखते हैं

कुछ न खुद के पास लेकिन ऐंठ में अव्वल है जो
उस अकड़ को शान से कपड़े बदलते देखते हैं