देह दीप में तेल हृदय यह
ज्योति पुष्प उर के उपवन में
खिला सदा है उसे निहारें,
सुख का सागर भीतर बहता
सदा रहा है उसे पुकारें !
नयनों में उसी का उजाला
अंतर में विश्वास बना है,
वही चलाता दिल की धड़कन
रग-रग में उल्लास घना है !
ज्योति वह दामिनी बन चमके
सूर्य चंद्रमा में भी दमके,
उसी ज्योति से पादप,पशु हैं
वही ज्योति हर जड़ चेतन में !
देह दीप में तेल हृदय यह
ज्योति समान आत्मा ही है,
माटी का हो या सोने का
दीपक आख़िर दीपक ही है !
ऐसे ही हैं तेल जगत में
कुछ सुवास से भरे हुए मन,
कई आँखों में धुआँ भरते
किंतु ज्योति न होती कभी कम !


