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गुरुवार, सितंबर 2

देह दीप में तेल हृदय यह


देह दीप में तेल हृदय यह


ज्योति पुष्प उर के उपवन में 

खिला सदा है उसे निहारें,

सुख का सागर भीतर बहता 

सदा रहा है उसे पुकारें !


नयनों में उसी का उजाला 

अंतर में विश्वास बना है, 

वही चलाता दिल की धड़कन 

रग-रग में उल्लास घना है !


ज्योति वह दामिनी बन चमके 

सूर्य चंद्रमा में भी दमके, 

उसी ज्योति से पादप,पशु हैं 

वही ज्योति हर जड़ चेतन में !


देह दीप में तेल हृदय यह 

ज्योति समान आत्मा ही है, 

माटी का हो या सोने का 

दीपक आख़िर दीपक ही है !


ऐसे ही हैं तेल जगत में 

कुछ सुवास से भरे हुए मन, 

कई आँखों में धुआँ भरते 

किंतु ज्योति न होती कभी कम !

शनिवार, जुलाई 15

उन अँधेरों से डरें क्यों

उन अँधेरों से डरें क्यों


खो गया है घर में कोई चलो उसे ढूँढ़ते हैं
बह रही जो मन की सरिता बांध कोई बाँधते हैं

आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें 
उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं

इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास अपने
उन अँधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता खोजते हैं

हँसे पल में पल में रोए मन शिशु से कम नहीं है
दूर हट के उस नादां की हरकतें हम देखते हैं

कुछ नहीं है पास खुद के बाँस जैसी खोखली जो
उस अकड़ को शान से चेहरे बदलते देखते हैं  

सोमवार, मई 27

इक दिया, कुछ तेल, बाती


इक दिया, कुछ तेल, बाती



खो गया है कोई घर में चलो उसको ढूँढ़ते हैं
बह रहा जो मन कहीं भी बांध कोई बाँधते हैं

आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें  
उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं

इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास हैं
उन अंधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता खोजते हैं

हँस दे पल में पल में रोए मन शिशु से कम नहीं
दूर हट के उस नादां की हरकतें हम देखते हैं

कुछ न खुद के पास लेकिन ऐंठ में अव्वल है जो
उस अकड़ को शान से कपड़े बदलते देखते हैं