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शुक्रवार, मई 1

बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस


बुद्ध पूर्णिमा और मई दिवस 

मार्क्स ने संगठित होने का मंत्र दे 

 मज़दूरों का आत्म सम्मान बढ़ाया

दिया बुद्ध ने मुक्ति का अष्टांगिक मार्ग 

विपासना ध्यान सिखाया !


श्रावक दिशा देता समाज को 

मिलता उसे सम्मान 

बराबर का भागीदार है श्रमिक 

राष्ट्र के विकास में 

 मिले, उसे भी समुचित प्रतिदान !

 

चिलचिलाती धूप में 

घंटों श्रम करता 

काट कर चट्टानों को 

सुरंगें बिछाता

श्रमिक रखता नींव 

आलीशान अट्टालिकाओं की 

श्रावक घंटों ध्यान साधना कर 

अपने भीतर जाता 

प्रेम और करुणा के 

स्रोत छिपे हैं जहाँ 

लाकर कुछ बूँदें जग में बहाता !

दोनों ही आदर के पात्र हैं 

समाज ऋणी है दोनों का ! 


बुधवार, मई 1

मई दिवस पर

मई दिवस पर 


दुनिया बंट गई जब से 

मज़दूर और मालिक में 

बंदे और ख़ालिक में 

शोषित और शोषक 

तब से ही आये हैं अस्तित्त्व में 

पर अब समय बदल रहा है 

श्रमिक भी सम्मानित किए जाते हैं 

सफ़ाई कर्मचारियों के पैर 

पखारे जाते हैं 

आगे की पंक्तियों में स्थान मिलता है 

श्रमिकों को सभाओं में 

श्रम की महत्ता को हम स्वीकारने लगे हैं 

मज़दूर दिवस पर लग रहे हैं नये नारे 

दुनिया के सब लोगों एक हो जाओ

एक तरह से यहाँ सभी श्रमिक हैं 

श्रम के बिना यहाँ कुछ भी नहीं मिलता है 

हाँ, श्रम शारीरिक, मानसिक

या बौद्धिक हो सकता है 

घंटों कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठे 

युवा भी श्रमिकों की श्रेणी में आ सकते हैं
रेढ़ी-पटरी वाले और उनको 

ऋण देने वाले बैंक के कर्मचारी 

 दोनों ही समाज का काम करते हैं 

श्रम करते हैं खिलाड़ी 

देश का नाम होता है 

चींटी भी कम श्रम नहीं करती 

घर बनाने और जमा करने में भोजन 

बोझ केवल आदमी ही नहीं उठाता 

पशु भी भागीदार हैं युगों से 

नन्हा शिशु भी पालने में पड़ा -पड़ा 

हाथ पैर मारता है 

श्रम की महत्ता 

प्रकृति का हर कण सिखलाता है !