मन की मछरिया
शब्दों के जाल में
मन की मछली अक्सर फंस जाती है
स्रोत से दूर होकर व्यर्थ ही छटपटाती है
जल से बनी है वह भूल ही जाती है
चाहे तो पल भर में छिद्रों से निकल जाए
जाल कोई पल भर भी
बांध नहीं उसे पाए
पर रूप धरा झूठा ही
मोह, माया, मान का
जाने किस बात की मिथ्या
आन बान का
टूटता नहीं भरम इसके अभिमान और गुमान का
शायद शब्दों का जाल भी स्वयं ही सजाती है
क़ैद किया स्वयं को फिर कसमसाती है
पल भर भी शांत हो
पिघल पिघल जाएगी
जल में विलीन हो जल ही हो जाएगी
ख़ाली और रिक्त है
पर रूप नए बनाती है
शब्दों के जाल में
मन की मछरिया !
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