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रविवार, अगस्त 29

अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला


अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला

मथुरा रोयी होगी उस दिन 

कान्हा चले जब यमुना पार,

जिस धरती पर हुए अवतरित

 दे नहीं पायी उन्हें दुलार !


अभी तपस्या की बेला है 

बारह वर्षों की प्रतीक्षा,

लौट करेंगे कृष्ण किशोर

कंस के कृत्य की समीक्षा !


अभी तो गोकुल जाते कान्ह 

नन्द, यशोदा को हर्षाने,

ग्वालों, गैयों, साथ खेलने

संग गोपियों रास रचाने !


माखन चोरी, मटकी फोड़ी

असुर-वध किये  नित नव लीला,

मनहर नृत्य, बाँसुरी वादन

ब्रज वासी कान्हा रंगीला !


पलक झपकते बीता बचपन

 मथुरा जाने का दिन आया,

तड़पा हर ब्रज वासी का उर

नन्द यशोदा को तड़पाया !


राधा की आँखें बरसीं थीं 

विरहा की पीड़ा थी भारी,

अद्भुत बड़ी कृष्ण की लीला,

 अब तक सारी दुनिया वारी !




गुरुवार, अगस्त 9

मानो हुआ प्रेम साकार


कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक शुभकामनायें...

मानो हुआ प्रेम साकार

अति सुहाना समय हुआ था
शांत-सौम्य, सारा ब्रह्मांड,
चमक रहे थे झिलमिल तारे
दिशा स्वच्छ, निर्मल आकाश !

नदियों का जल निर्मल, शीतल
खिले हुए अनगिनत कमल,
शीतल, मंद, सुगन्धित वायु
रह-रह कर छूती यमुना जल !

गूंज उठा बालक के स्वर से
मथुरा का वह कारागार,  
सुंदर, श्यामल देह अनूठी
मानो प्रेम हुआ साकार !

कम्पित हुआ कंस भी होगा
पुत्र आठवाँ काल था उसका,
किये मूर्छित रक्षक सारे
ले आश्रय योगमाया का !

घिर आयी तब घटा अचानक
जल से भरे हुए बादल थे,
गहन अंधकार छाया था
बरसे झूम एक जलथल थे !

वसुदेव गोकुल जा पहुँचे
पार किया यमुना का पाट,
सोयी कन्या बदले में ली
कान्हा भया नन्द का लाल !

रस स्वरूप वह कृष्ण कन्हाई
प्रेम भरे अंतर में रहता,
सुख की सदा फुहार बरसती
नयनों से अश्रु जल बहता !

मधुर वेदना बन आता है
नेह, राग, अनुराग भी कह लें,
प्रेम के जितने रूप जानते
उस कान्हा को देकर बह लें !

ज्यों तरंग पूछे सागर से
कहाँ है जल? मैं ही तो हूँ
कोई पूछता है कान्हा से
कहाँ हो तुम ? बस मैं ही तो हूँ

पिघल गया हो नेह ताप से
वह अंतर जो निर्मल, कोमल,
सहज ही बहता कृष्ण ओर वह
ज्यों नदिया खोजे सागर जल !

एक ही बाधा है मिलने में
बीच खड़ी मैं की दीवार,
कुम्भ के भीतर-बाहर जल है
टूटे से होता इक सार !  
  
  





बुधवार, सितंबर 1

कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी 

मथुरा रोयी होगी उस दिन, कृष्ण चले जब यमुना पार 
जिस भूमि पर हुए अवतरित, न दे पायी उन्हें दुलार I 

अभी तपस्या की बेला है, बारह वर्षों की प्रतीक्षा 
लौट करेंगे कृष्ण किशोर, कंस कृत्य की समीक्षा I 

अभी तो गोकुल जाते कान्हा, नन्द यशोदा को हर्षाने 
ग्वालों, गैयों, संग खेलने, संग गोपियों रास रचाने I 

माखन चोरी, मटकी तोड़ी, असुर-वध नित नयी लीला 
मधुर वचन, बांसुरी वादन, ब्रज वासी कृष्ण रंगीला I 

पलक झपकते बीता बचपन, मथुरा जाने का दिन आया 
तड़पा हर ब्रज वासी का उर, नन्द यशोदा उर घबराया I 

राधा की आँखें बरसीं विरह की पीड़ा थी भारी 
अद्भुत थी कृष्ण की लीला, अब तक सृष्टि है वारी I 

अनिता निहालानी 
१ सितम्बर २०१०