कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक शुभकामनायें...
मानो हुआ प्रेम साकार
अति सुहाना समय हुआ था
शांत-सौम्य, सारा ब्रह्मांड,
चमक रहे थे झिलमिल तारे
दिशा स्वच्छ, निर्मल आकाश !
नदियों का जल निर्मल, शीतल
खिले हुए अनगिनत कमल,
शीतल, मंद, सुगन्धित वायु
रह-रह कर छूती यमुना जल !
गूंज उठा बालक के स्वर से
मथुरा का वह कारागार,
सुंदर, श्यामल देह अनूठी
मानो प्रेम हुआ साकार !
कम्पित हुआ कंस भी होगा
पुत्र आठवाँ काल था उसका,
किये मूर्छित रक्षक सारे
ले आश्रय योगमाया का !
घिर आयी तब घटा अचानक
जल से भरे हुए बादल थे,
गहन अंधकार छाया था
बरसे झूम एक जलथल थे !
वसुदेव गोकुल जा पहुँचे
पार किया यमुना का पाट,
सोयी कन्या बदले में ली
कान्हा भया नन्द का लाल !
रस स्वरूप वह कृष्ण कन्हाई
प्रेम भरे अंतर में रहता,
सुख की सदा फुहार बरसती
नयनों से अश्रु जल बहता !
मधुर वेदना बन आता है
नेह, राग, अनुराग भी कह लें,
प्रेम के जितने रूप जानते
उस कान्हा को देकर बह लें !
ज्यों तरंग पूछे सागर से
कहाँ है जल? ‘मैं ही तो हूँ’
कोई पूछता है कान्हा से
कहाँ हो तुम ? बस मैं ही तो हूँ
पिघल गया हो नेह ताप से
वह अंतर जो निर्मल, कोमल,
सहज ही बहता कृष्ण ओर वह
ज्यों नदिया खोजे सागर जल !
एक ही बाधा है मिलने में
बीच खड़ी ‘मैं’ की दीवार,
कुम्भ के भीतर-बाहर जल है
टूटे से होता इक सार !
