कृष्ण जन्माष्टमी पर
काल सुहाना बन आया था
भादों की अष्टमी आयी,
जगी दिशाओं में भी आशा
मंगलमयी भूमि हर्षाई !
नदियाँ भी आनंद से भरीं
सरवर खिले उत्प्लों से थे,
अग्नि प्रज्वलित हुई
प्रसन्न हो,
वायु भरी स्नेह सुरभि से !
कारागार में जन्मे थे स्वयं
मुक्त किया जग भव बन्धन से
था नक्षत्र रोहिणी पावन
प्रकटे रस नन्द नन्दन थे !
थी मध्य रात्रि घोर अँधेरा
बनकर आये ज्यों दिनमान,
अद्भुत रूप धरा कृष्णा ने
कोमल काया कमल समान !
कानों में झिलमिल कुंडल
मोर पंख केशों में सज्जित,
अंग-अंग है सुंदर जिसका
ऐसे श्यामल महिमा मंडित !
दिव्य जन्म व कर्म दिव्य
हैं
मुरली मनोहर मधुमय कृष्णा,
मिलन और विरह दोनों में
याद भी उनकी सुख स्वरूपा !


