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मंगलवार, अक्टूबर 16
रौशनी थी हर कहीं
रौशनी थी हर कहीं
कुछ कहा हमने नहीं
सुन लिया उसने कहीं,
तार कोई थी जुड़ी
देख जग पाता नहीं !
एक तितली पास आ
इक सँदेसा दे गयी,
एक बदली सूर्य से
उतार ओढ़नी गयी !
डालियाँ सजने लगीं
दूब में भी आभ थी,
कोहरे बहने लगे
रौशनी थी हर कहीं !
सरल मुद्रा में मनस
गोपियों सी सादगी,
उतर शिखरों से बहे
घाटियों सी शामनी !
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