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बुधवार, जून 9

नूतन तरु के गात हो रहे

 नूतन तरु के गात हो रहे 

निर्मल गंगाजल से बहते  

तुम ही श्यामल घन बन बरसे, 

चिन्मय ! चेतनता बन रहते 

है कण-कण में गति भी तुमसे !


खो, पुनः-पुनः तुम्हें पाना है 

जैसे दिन और रात हो रहे, 

नित नवीन संबंध जुड़े ज्यों 

 नूतन तरु के गात हो रहे !


शब्दों को आशय तुम देते 

वाणी के तुम संवाहक हो, 

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं 

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


तुम बिन रहे अधूरा सा सब 

जीवन अर्थवान हो तुमसे, 

मननशील हो मानस जिनका 

मनुज वही बन पाते ऐसे !


रविवार, जुलाई 8

ओह ! फिर बिजली चली गयी


ओह ! फिर बिजली चली गयी

गूंज रही मधु सम इक कूक
भोर सुहानी, तपती धूप,
जाने किस मस्ती में ड़ूबे
नन्हें शावक, सुंदर रूप !

बिजली-बिजली करता मानव
वे तपती दोपहर में गाते,
सर्दी, गर्मी, हो बहार या
सारे मौसम इनको भाते !

अभी जुड़े हैं शायद उससे
हम बिछड़े हैं जाने कब से,
भीतर कोई स्रोत खो गया
कितना दुर्बल मनुज हो गया !

किस-किस का यह हुआ गुलाम
रहा नहीं मेहनत के काम,
कैसे उसे नचाता है मन
पल-पल करता उसे सलाम !

सादा जीवन, हल्का सा मन
देह भी फूल सी महक उठेगी,
भीतर छिपी आत्मज्योति जो
कण-कण से फिर स्वयं झलकेगी !

सोमवार, अक्टूबर 10

क्या दमन ही आज की पहचान है


क्या दमन ही आज की पहचान है


मूल्य बदले ब्रांड में बिक रहा इंसान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

सर्वमान्य सच बनी है, मनुज की आधीनता
मुक्त होना दूर अब तो, सज रही है दासता

जल रहा जग, लोभियों का यह महाशमशान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

आधुनिक होना शरम को, ताक पर देना है रख
भागते रहना सुबह से शाम तक, फिर बेसबब

क्रूर हिंसा, वासना को पोषणा अब शान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

मौन हैं जिनके सहारे, सौंप डालीं कश्तियाँ
सिर झुकाए झेलतीं हैं, दर्द सारी बस्तियां

तोड़ता दम लोक का हर आखिरी निशान है
क्या दमन ही आज की पहचान है !

तोड़ डाले हौसले व हक सभी प्रतिरोध के
रौंधकर सपने, किये हैं मूक स्वर आक्रोश के

एक अनदेखी दिशा से बढ़ रहा तूफान है  
क्या दमन ही आज की पहचान है !