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सोमवार, सितंबर 29

सजगता

सजगता 


छुपे हुए हैं भेड़िये छद्म रूप में 

जो रोकते हैं कदमों को 

आगे बढ़ने से 

नहीं काम आते मोह से बंधे जन 

सहायक होता है कोई अन्य ही 

अस्तित्त्व से भेजा हुआ 

सजग रहना होगा हर पल 

यदि चलते जाना है 

अमृत पथ पर 

कंटक रोक न लें 

पाहन बाधा न बनें 

‘आज’ फल है ‘कल’ का 

‘आज’ ही ‘कल’ बनेगा 

बह जायेगा हर कलुष 

जब सजगता का 

छल-छल जल बहेगा !


बुधवार, दिसंबर 16

चिदाकाश में भरे उड़ान

चिदाकाश में भरे उड़ान 

मोह तमस का जाल बिछा है 
हंस बना है उसका कैदी, 
सुख के दाने कभी-कभी हैं 
उहापोह है घड़ी-घड़ी की !

टूटे जाल मुक्त हो हंसा 
चिद आकाश में भरे उड़ान, 
गीत गूँजते कण-कण में जो 
सुनकर मगन हुआ अनजान ! 

देह में रह विदेह बना जो 
राज वही जीवन का जाने, 
जल में नाव, नाव में जल ना  
यही कह गए सभी सयाने !

देह छूटती जाती पल-पल 
इक दिन उड़ कर जाना होगा, 
तब तक जग का मेला देखेँ 
जो ना कभी पुराना होगा !

ज्योति मिले ज्योति संग जिस पल  
याद उसी की बनी रहे उर, 
सहज नदी यह बहती जाती 
पहुँचेगी इक दिन तो सागर !
 

गुरुवार, अगस्त 20

मोह और प्रेम

 मोह और प्रेम 

 

जहाँ छूट ही जाने वाला है 

सब कुछ एक दिन 

वहाँ कर सकता है मोह 

कोई मदहोश होकर ही

जहां काल चारों ओर

अपने विकराल पंजे फैलाये खड़ा है 

वहाँ संग्रह किसका करें 

जो मृत्यु के बाद भी नहीं मरता 

उसे क्या चाहिए ?

जो छूट ही जायेगा 

उसे कौन सहेजे 

पैरों में क्यों बांधें जंजीरें 

हजार वस्तुओं के संग्रह से 

पंछी को उड़ ही जाना है 

तो क्यों लगन लगायेगा 

पिंजरे से 

चाहे सुवर्ण का ही हो 

पिंजरा तो पिंजरा है 

सुख जोड़ने में नहीं छोड़ने में है 

मुक्त हृदय से हर बन्धन तोड़ने में है 

प्रेम तो स्वभाव है स्वयं का 

वह हर आग में जलने से बच ही जायेगा

जिसे साथ जाना है 

वह किसी भांति  मिटाया न जायेगा  !