चिदाकाश में भरे उड़ान
मोह तमस का जाल बिछा है
हंस बना है उसका कैदी,
सुख के दाने कभी-कभी हैं
उहापोह है घड़ी-घड़ी की !
टूटे जाल मुक्त हो हंसा
चिद आकाश में भरे उड़ान,
गीत गूँजते कण-कण में जो
सुनकर मगन हुआ अनजान !
देह में रह विदेह बना जो
राज वही जीवन का जाने,
जल में नाव, नाव में जल ना
यही कह गए सभी सयाने !
देह छूटती जाती पल-पल
इक दिन उड़ कर जाना होगा,
तब तक जग का मेला देखेँ
जो ना कभी पुराना होगा !
ज्योति मिले ज्योति संग जिस पल
याद उसी की बनी रहे उर,
सहज नदी यह बहती जाती
पहुँचेगी इक दिन तो सागर !
