जाल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जाल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, दिसंबर 16

चिदाकाश में भरे उड़ान

चिदाकाश में भरे उड़ान 

मोह तमस का जाल बिछा है 
हंस बना है उसका कैदी, 
सुख के दाने कभी-कभी हैं 
उहापोह है घड़ी-घड़ी की !

टूटे जाल मुक्त हो हंसा 
चिद आकाश में भरे उड़ान, 
गीत गूँजते कण-कण में जो 
सुनकर मगन हुआ अनजान ! 

देह में रह विदेह बना जो 
राज वही जीवन का जाने, 
जल में नाव, नाव में जल ना  
यही कह गए सभी सयाने !

देह छूटती जाती पल-पल 
इक दिन उड़ कर जाना होगा, 
तब तक जग का मेला देखेँ 
जो ना कभी पुराना होगा !

ज्योति मिले ज्योति संग जिस पल  
याद उसी की बनी रहे उर, 
सहज नदी यह बहती जाती 
पहुँचेगी इक दिन तो सागर !
 

गुरुवार, मई 14

शब्द जाल

शब्द जाल

शब्दों के जाल में मन का पंछी फंस गया है 
मात्र शब्द हैं वे पर दंश उनका डस गया है 
शब्द हजार हों या लाख 
फिर भी उनकी सीमा है 
मौन हर हाल में उनसे बड़ा है 
हाँ, स्वर उसका अति धीमा है 
शब्दों से ज्ञान मिलेगा 
कितना बड़ा भ्रमजाल फैलाया है
ज्ञान अनंत है भला चन्द शब्दों में कहीं वह समाया है 
तभी ऐसा कहा जा सकता है 
हैं ‘राम’ में तीन लोक समाए 
ताकि शब्दों के जाल से मुक्त हुआ जाए !

मंगलवार, मई 1

अर्थवान हों शब्द हमारे



अर्थवान हों शब्द हमारे

शब्दों का संसार सजाया
मन जिसमें डूबा उतराया,
पहुँचा कहीं न लोटपोट कर
वैसे का वैसा घर आया !

शब्दों की लोरी बन सकती
तंद्रा भीतर जो भर देती,
नहीं जागरण संभव उससे
नींद को वह गहरा कर देती !

शब्दों को तलवार बनाया
इनको ही तो ढाल बनाया,
मोती कुछ लेकर आयेंगे
शब्दों का इक जाल बनाया !

शब्द अकेले क्या कर सकते
यदि  न अर्थ उनमें भर सकते,
अर्थ बिना न कोई कीमत
शब्द नहीं पीड़ा हर सकते !

अर्थ वही जो अनुभव देता
प्रामाणिक जीवन कर देता,
परिवर्तन कर अणु-अणु का
भावमय अंतर कर देता !