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शुक्रवार, मई 3

संबंध

संबंध 


यह जगत एक आईना है ही तो है 

हर रिश्ते में ख़ुद को देखे जाते हैं  

चुकती नहीं अनंत चेतना 

हज़ार-हज़ार पहलू उभर जाते हैं 

जन्म पर जन्म लेता है मानव 

कि कभी तो जान लेगा सम्पूर्ण 

ख़ुद को 

पर ऐसा होता नहीं 

जब तक अनंत को भी 

अनंतता का दीदार नहीं हो जाता 

तब तक बनाता रहता है संबंध 

विचारों, भावों, मान्यताओं 

और व्यक्तियों से 

वस्तुओं, जगहों, मूर्त और अमूर्त से 

यदि प्यार बाँटता है निर्विरोध 

तो भीतर सुकून रहता है 

रुकावट है यदि किसी भी रिश्ते में 

तो ख़ुद का ही दम घुटता है !




मंगलवार, सितंबर 5

रिश्ता इक अद्भुत बन जाता




रिश्ता इक अद्भुत बन जाता


शिक्षा, शिक्षण तथा प्रशिक्षक 

मानवता के पावन रक्षक, 

कोरे मन पर लिखें इबारत 

बन जाते हैं वही परीक्षक !


​​समुचित सम्मति देते शिक्षक 

सही-ग़लत का भेद बताते, 

लक्ष्य प्राप्त कर लें जीवन का 

विद्यार्थियों  को पथ सुझाते !


श्रेष्ठता का वरण करें सदा 

माध्यम  भी नैतिक  अपनायें, 

गुण-कमियों का करे आकलन 

शिष्य का मस्तिष्क पढ़ पाये !


मन में करुणा और दया भर 

सदा छात्र पर प्रेम लुटाये,  

जो शिक्षा का मोल न समझे

उसे भी धैर्य से समझाये !


आजीविका के योग्य बनाते 

भाषा वाणी शुद्ध बनाते, 

शिक्षक दिल में रह बच्चों के 

जीवन का मर्म समझाते !


उपलब्धि पर सदा शिष्यों की 

गर्व सदा शिक्षक को होता 

छात्र उन्हें आदर्श मानते 

रिश्ता इक अद्भुत बन जाता !



शुक्रवार, सितंबर 27

एक पाती मृणाल ज्योति के नाम


एक पाती मृणाल ज्योति के नाम


बरसों पहले जब तुम्हारा जन्म ही हुआ था
नन्हे थे तुम अभी नामघर में पल रहे थे
एक दिन अवसर मिला था मुलाकात का
सिलसिला वह रुका नहीं और...
 एक रिश्ता बनता गया
तुमसे किसी गहरे जज्बात का !
साक्षी बनी उस दिन की जब
दुलियाजान क्लब में एक मेला लगा था
अनेक तरह के सबने स्टाल लगाये
नेहरू मैदान तक एक बार जुलूस भी निकला था
राखियाँ बनाकर क्लब में लगाई थीं दुकानें
ऐसे ही न जाने कितने हैं अफसाने
सफाई अभियान में झाड़ू लगाया
स्टेज पर कार्यक्रम का संचालन किया
राजगढ़ में बनी साक्षी नई शाखा की
भाग लिया 'परिवार' के कार्यक्रम में
दुलियाजान व डिब्रूगढ़ में
बच्चों को कुछ माह हिंदी पढ़ाई
योग व प्राणायाम की विधि सिखाई
शिक्षकों के साथ भी बिताये कुछ पल
पहचानें वे स्वयं को दिया इसके लिए संबल
आज जाने की बेला है
मन में यादों का एक रेला है
समय-समय पर कितनी मासूम आवाजों ने तुम्हें पुकारा है
आज युवा हो गये हो
अनगिनत समर्थ हाथों ने तुम्हें संवारा है
इसी तरह तुम्हें आगे भी बलवान होना है
अपने पैरों पर खड़े ही नहीं होना
हर बच्चे की आशाओं पर कुर्बान होना है !

मंगलवार, दिसंबर 6

बस वही खिल मुस्कराया

बस वही खिल मुस्कराया


एक रिश्ता दोस्ती का
 फलसफा यह जिंदगी का,
खूबसूरत सा जहाँ  यह
एक नाता हो ख़ुशी का !

अजनबी बनकर रहा जो
भेंट आँसूं , दर्द पाया,
घर बनाया जग को जिसने
बस वही खिल मुस्कराया !

चाँद-तारे गा  रहे यह
फूल, पंछी भी सुनाते,
झोलियाँ भर गीत उर में
हर घड़ी वे गुनगुनाते !

बह  रहा अंतर गुहा से
एक निर्झर  प्रीत का है,
द्वार खुलते ही मिलेगा
पाहनों से जो ढका है  !

सुन रही सारी  दिशाएँ
खोल दें अरमान दिल के,
बाँह  फैलाये खड़ा वह
निकट आ जाएगा चल के !