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शुक्रवार, अप्रैल 26

पंछी इक दिन उड़ जाएगा

पंछी इक दिन उड़ जाएगा 


जरा, रोग की छाया डसती 

मृत्यु, मुक्ति की आस बँधाये, 

पंच इंद्रियाँ शिथिल हुई जब  

जीवन में रस, स्वाद न आये !


कुछ करने की चाह न जागे  

फिर भी आशा देह चलाती, 

जीवन की संध्या बेला में  

पीड़ा उर में रहे सताती !


धन का मोह, मोह पदार्थ का 

अंतिम क्षण तक  रहता जकड़े,

ख़ुद की महिमा समझ न पाया 

मानव मरते दम तक अपने !


 ज्वाला क्रोध जलाया करती 

पहन मुखौटा जग से मिलता, 

कभी-कभी ही सहज प्रेम से 

अंतर कमल जीव का खिलता !


या निर्मल प्रेम संग मन में

काँटा भीतर चुभता रहता, 

भय का एक आवरण मन को 

भ्रमित करे, सुख हरता रहता !


सौ-सौ कष्ट सहे जाता है 

किंतु मोह अतीव जीवन से, 

पंछी इक दिन उड़ जाएगा 

बंधा हुआ जीव तन-मन से ! 


मोह मिटेगा, शांति मिलेगी, 

तोड़ा जब बंधन माया का, 

झुकी कमर, बलहीन हुआ तन 

पुनर्जन्म होगा काया का !


ख़ुशी-ख़ुशी जग विदा करेगा 

पाथेय प्रेम संग बांध दे, 

पथिक चला जो नयी राह पर 

शुभता से उसका मन भर दे !



मंगलवार, अप्रैल 30

वृद्धावस्था




वृद्धावस्था 

नहीं भाता अब शोर जहाँ का
अखबार बिना खोले पड़ा रह जाता है
टीवी खुला भी हो तो दर्शक
सो जाता है
गर्दन झुकाए किसी गहन निद्रा में
आकर्षित नहीं कर पाते मनपसंद पकवान भी
नहीं जगा पाते ललक भीतर
न ही भाता है निहारना आकाश को
कुछ घटता चला जाता है अंतर्मन पर
ऊर्जा चुक रही है
शिथिल हो रहे हैं अंग-प्रत्यंग
दर्द ने अब घर बना लिया है स्थायी...
झांकता ही रहता है किसी न किसी खिड़की से तन की
छड़ी सहचरी बनी है
कमजोरी से जंग तनी है
दवाएं ही अब मित्र नजर आती हैं
रह-रह कर बीती बातें यद आती हैं
जीवन की शाम गहराने लगी है
नीड़ छोड़ उड़ गए साथी की पुकार भी
अब बुलाने लगी है
रंग-ढंग जीवन के फीके नजर आते हैं
कोई भाव भी नजर नहीं आता सपाट चेहरे पर
कोई घटना, कोई वाकया नहीं जगाता अब खुशी की लहर
क्या इतनी बेरौनक होती है उसकी आहट
इतनी सूनी और उदास होती है
रब की बुलाहट
क्यों न जीते जी उससे नाता जोड़ें
आखिरी ख्वाब से पहले उसकी भाषा सीखें
मित्र बनाएँ उसे भी जीवन की तरह
तब उसका चेहरा इतना अनजाना नहीं लगेगा
उसका आना इतना बेगाना नहीं लगेगा !






शनिवार, सितंबर 22

क्षण क्षण बजती है रुनझुन




क्षण क्षण बजती है रुनझुन

दीन बना लेते हम स्वयं को
ऊंचा उठने की खातिर,
जो जैसा है श्रेष्ठ वही है
हो वैसे ही जग जाहिर !

फूल एक नन्हा सा हँसता
अपनी गरिमा में खिलकर,
होंगे सुंदर फूल और भी
पर न उसे सताते मिलकर !

मानव को यह रोग लगा है
खुद तुलना करता रहता,
दौड लगाता पल-पल जग में
 उर संशय भरता रहता !

जिसको देखो दौड़ रहा है
जाने क्या पाने की धुन,
पल भर का विश्राम न घटता
क्षण क्षण बजती है रुनझुन  !

ठहर गया जो अपने भीतर
खो जाते हैं भेद जहाँ,
थम जाती है जग की चक्की
जीवन लगता खेल वहाँ !