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मंगलवार, नवंबर 3

निज उजास का करने वितरण


निज उजास का करने वितरण

चिन्मय बसा रहे मेधा में

योग्य वरण के एक ईश है,

जग यह मोहक रूप धर रहा

सुंदर उससे कौन शीश है !

 

उसे जानना पाना उसको

हो शुभ जीवन का लक्ष्य यही,

जिससे परम प्रपंच घटा है

महिमा सदा अनंत अगम की !

 

वही श्रेष्ठ विभु सुख का सागर

नीर, वायु, पावक का दायक, 

जड़ यह पाँच भूतों की सृष्टि

चेतन वही ज्ञान संवाहक !

 

उस चेतन का ध्यान धरें हम

उसके हित ही उसे भजें हम,

जग ही माँगा यदि उससे भी

व्यर्थ रहेगा यह सारा श्रम !

 

उसके सिवा न कोई दूजा

इन श्वासों का वही प्रदाता,

प्रज्ञा, मेधा, धी उससे है

ज्ञान स्वरूप वही है ज्ञाता !

 

वही चेतना वही बोध है

उसका ही हो मन में चिंतन,

आनंद का स्रोत अजस्र है

स्फुरण सहज वही, वही स्पंदन !

 

तेरी महिमा तू ही जाने

मेधा में मणि जैसा दमके,

यही कामना है अंतर की

अपनी गरिमा में नित चमके !

 

सभी कारणों का वह कारण

खुद रहता है सदा अकारण,

सुंदर दुनिया एक रचायी

निज उजास का करने वितरण !

 

अहंकार कर जिस क्षण भूला

टूट गई वह डोर प्रीत की,

मन विवेक का थामे दामन

दुविधा छूटे हार-जीत की !

 

अविनाशी कण-कण में देखे

शाश्वत हर घटना के पीछे,

हर अंतर में छुपा पुरातन

मौन ध्यान में सहज निहारे ! 


शुक्रवार, मई 22

‘तू’ ‘मैं’ होकर ही खिलता है

‘तू’ ‘मैं’ होकर ही खिलता है 


‘मैं’ ‘तू’ होकर ही मिलता है 
‘तू’ ‘मैं’ होकर ही खिलता है, 
मन अंतर में यह खेल चले 
बाहर इक कण ना हिलता है !

जो विभु अतीव वह क्षुद्र बना 
सागर से ही हर लहर उठी, 
 मायापति वरत योगमाया 
यह मन माया से रचता है !

जब तक यह भेद नहीं जाना 
मैं'' खुद को ही स्वामी समझे,
फिर जो भी कर्म किये उसने 
उसके बंधन में फँसता है !

यदि खुद का किया नहीं रुकता 
यह चक्र कभी ना टूटेगा, 
इक कठपुतली सा नाच रहा 
अनजाना बना फिसलता है !

जो झुक जाये उन चरणों में 
‘मैं’ को ‘तू’ ही ढक लेता जब, 
सुन मद्धिम सी आवाजों में 
कुछ सूत्र नए, संभलता है !

जैसे-जैसे ‘मैं’ ‘तू’ बनता 
‘तू’ ही ‘तू’ रह जाता केवल  
फिर कैसा कर्मों का बंधन
मन पंछी बना विचरता है !