स्वामी-दास
कोई स्वामी
है कोई दास
है अपनी-अपनी फितरत की बात
किसका ?
यह है वक्त का तकाजा
स्वामी
माया का चैन की नींद सोता
क्षीर सागर में भी
सर्पों
की शैया पर !
गुलाम वातानुकूलित कक्ष में
करवटें बदलता है
मखमली
गद्दों पर !
मन
का मालिक शीत, घाम
सहज
ही बिताता है
गुलाम
हड्डियाँ कंपाता,
कभी
पसीने से अकुलाता है
स्वामी
है जो स्वाद का
दाल-रोटी खाकर भी
गीत गुनगुनाता है
भोजन
का दास
पाचक खाकर ही निगल पाता है
हर
पल उत्सव मनाए स्वामी
दास
बेबात मुँह फुलाता है
हजार
उपाय करता
गम
भुलाने के वह
फिर
एक न एक दिन
शरण
में स्वामी की आ ही जाता है !


