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मंगलवार, नवंबर 24

स्वामी-दास

स्वामी-दास

 

कोई स्वामी है कोई दास

 है अपनी-अपनी फितरत की बात

किसका ? यह है वक्त का तकाजा  

स्वामी माया का चैन की नींद सोता

 क्षीर सागर में भी

सर्पों की शैया पर !

 गुलाम वातानुकूलित कक्ष में

 करवटें बदलता है

मखमली गद्दों पर !

मन का मालिक शीत, घाम

सहज ही बिताता है

गुलाम हड्डियाँ कंपाता,

कभी पसीने से अकुलाता है

स्वामी है जो स्वाद का

 दाल-रोटी खाकर भी

 गीत गुनगुनाता है

भोजन का दास

 पाचक खाकर ही निगल पाता है

हर पल उत्सव मनाए स्वामी

दास बेबात मुँह फुलाता है

हजार उपाय करता

गम भुलाने के वह

फिर एक न एक दिन

शरण में स्वामी की आ ही जाता है !

 


शुक्रवार, मई 22

‘तू’ ‘मैं’ होकर ही खिलता है

‘तू’ ‘मैं’ होकर ही खिलता है 


‘मैं’ ‘तू’ होकर ही मिलता है 
‘तू’ ‘मैं’ होकर ही खिलता है, 
मन अंतर में यह खेल चले 
बाहर इक कण ना हिलता है !

जो विभु अतीव वह क्षुद्र बना 
सागर से ही हर लहर उठी, 
 मायापति वरत योगमाया 
यह मन माया से रचता है !

जब तक यह भेद नहीं जाना 
मैं'' खुद को ही स्वामी समझे,
फिर जो भी कर्म किये उसने 
उसके बंधन में फँसता है !

यदि खुद का किया नहीं रुकता 
यह चक्र कभी ना टूटेगा, 
इक कठपुतली सा नाच रहा 
अनजाना बना फिसलता है !

जो झुक जाये उन चरणों में 
‘मैं’ को ‘तू’ ही ढक लेता जब, 
सुन मद्धिम सी आवाजों में 
कुछ सूत्र नए, संभलता है !

जैसे-जैसे ‘मैं’ ‘तू’ बनता 
‘तू’ ही ‘तू’ रह जाता केवल  
फिर कैसा कर्मों का बंधन
मन पंछी बना विचरता है !


रविवार, अप्रैल 19

साया बनकर साथ सदा है

साया बनकर साथ सदा है

 

कोई अपनों से भी अपना 
निशदिन रहता संग हमारे,
मन जिसको भुला-भुला देता 
जीवन की आपाधापी में !

कोमल परस, पुकार मधुर सी 
अंतर पर अधिकार जताता,
नजर फेर लें घिरे मोह में 
प्रीत सिंधु सनेह बरसाता !

साया बनकर साथ सदा है 
नेह सँदेसे भेजे प्रतिपल,
विरहन प्यास जगाये उर में 
बजती जैसे मधुरिम कलकल  ! 

जगो ! वसन्त जगाने आया 
कोकिल गूंज गूंजती वन-वन,
भरे सुवास पुष्पदल महकें 
मदमाता सा प्रातः समीरण !

जागें नैना मन भी जागे
चेतनता कण-कण से फूटे,
मेधा जागे, स्वर प्रज्ञा के 
हर प्रमाद अंतर से हर ले ! 

अखिल विश्व का स्वामी खुद ही 
रुनझुन स्वर से प्रकट हो रहा,
भू से लेकर अंतरिक्ष तक
कैसा अद्भुत नाद गूँजता ! 

कान लगाओ, सुनो जागकर 
वसुधा में अंकुर गाते हैं,
सागर की उत्ताल तरंगे 
नदियों के भंवर भाते हैं !

गुरुवार, मार्च 26

प्रकृति और मानव

प्रकृति और मानव 

एक मास्टर स्ट्रोक मारा उसने 
और बता दिया... कौन है मालिक ?
चेतावनी दी थी 
सुनामी भेजी, कई तूफान भेजे
भूमिकम्प में भी राज खोला था 
इबोला में भी वही बोला था 
पर हमारे कान बहरे थे 
नहीं सुनी हमने प्रकृति की पुकार 
जो लगा रही थी वह बार बार 
जारी रखा अपनी कामनाओं का विस्तार 
भूल गए अपने ही स्रोत को 
भूल गए कि.. हम प्रकृति के स्वामी नहीं 
हैं उसका ही अंग  
सुविधाओं के लोभ में  निरंकुश दोहन कर, 
कर रहे खुद से ही जंग  
जंगल खत्म हो रहे और 
हवा में घुलता जा रहा था जहर 
 सागरों की अतल गहराई तक प्लास्टिक का कचरा 
अब बैठे हैं अपने-अपने घरों में 
नहीं भर रहे नालियों में पॉलीथिन, प्लास्टिक के ग्लास और कटोरे 
बन्द है पार्टियों में व्यर्थ का आडम्बर 
कुछ दिनों के लिए ही सही 
जो भी व्यर्थ है, वह हमसे छुड़वाया जा रहा है 
कोरोना के बहाने हमें दर्पण दिखाया जा रहा है !