तृषित उर को पोषता सा
अनदिखा है मीत कोई
अनलिखा है गीत कोई,
दौड़ती रग-रग में जैसे
अनछुई सी प्रीत कोई !
एक मादक शाम हो ज्यों
गोपियों का गाम हो ज्यों,
रम रहा हर रोम में जो
जानकी का राम हो ज्यों !
कार्तिक की धूप जैसा
कामिनी के रूप जैसा,
तृषित उर को पोषता सा
मधुर जल के कूप जैसा !
राह का साथी बना हो
पेड़ पीपल का घना हो
पोंछ देती हर उदासी
विरह की सी वेदना हो !
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