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शुक्रवार, जुलाई 7

शरद की एक शाम

शरद की एक शाम


भीगी-भीगी दूब ओस से

हरीतिमा जिसकी मनभाती,

शेफाली की मोहक सुवास

झींगुर गान संग तिर आती !


शरद काल का नीरव नभ है

रिक्त मेघ से, दर्पण जैसा,

दमक रहा संध्या का तारा

चन्द्र बना सौंदर्य गगन का !


हल्की हल्की ठंडक प्यारी

सन्नाटे को सघन बनाती,

पेड़ों, पौधों की छायाएं

उपवन रहस्यमयी बनातीं !


नन्हें नन्हें कुछ कीट दूब में

श्वेत पतंगे ज्योति खोजते,

नवरात्रि पूजा के मंत्र स्वर

छन के आते मंदिर पट से !


एक और आवाज गूंजती

नीरवता को भंग कर रही,

बिजली चली गयी लगती है

जेनरेटर की धुन बज रही !


सोमवार, अगस्त 19

हरसिंगार के फूल झरे


हरसिंगार के फूल झरे


हौले से उतरे शाखों से
बिछे धरा पर श्वेत केसरी
हरसिंगार के प्रसून झरे !

रूप-रंग, सुगंध की निधियां
लुटा रहे भोले वैरागी
शेफाली के पुष्प नशीले !

प्रथम किरण ने छूआ भर था
शरमा गए, झरझर बरसते
सिउली के ये कुसुम निराले !

कोमल पुष्प बड़े शर्मीले
नयन खोलते अंधकार में
उगा दिवाकर घर छोड़ चले !

छोटी सी केसरिया डाँडी
पांच पंखुरी श्वेत वर्णीय
खिल तारों के सँग होड़ करें !

मदमाती सुवासित सौगात
बाँट रहे हैं मुक्त हृदय से
मीलों तलक फिजां महकाते !