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सोमवार, सितंबर 14

भारत माँ के भाल की बिंदी, अपनी प्यारी हिन्दी

भारत माँ के भाल की बिंदी 

अपनी प्यारी हिन्दी 

भाषा किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है. वह राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वह राष्ट्र को सशक्त करती है. राष्ट्र भाषा का दर्जा उसे ही मिलता है, जो भाषा सम्पूर्ण देश में सम्पर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लायी जाती हो, जो अधिक से अधिक लोगों द्वारा समझी जाती हो. हिंदी भारत की स्वयं सिद्ध राष्ट्र भाषा है.  जब भारत की स्वाधीनता का आन्दोलन तीव्र हुआ तब हिंदी का उपयोग बढ़ने लगा था. हिंदी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गयी थी. उस समय के सभी बड़े नेताओं ने यह जान लिया था कि लम्बे समय से हिंदी सारे भारत की एकता का कारण रही है. यह संतों, फकीरों, व्यापारियों तथा तीर्थयात्रियों द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग में प्रयुक्त होती रही है.

आज हिंदी भारत के एक विशाल क्षेत्र में बोली जाती है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, छतीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली एवं चंडीगढ़ में यह शत-प्रतिशत बोली व पढ़ी जाती है. यह निर्विवाद सत्य है कि चीनी भाषा के बाद संसार में दूसरे स्थान पर सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा का गौरव हिंदी को प्राप्त है. देश में ही नहीं विदेशों में बसे करोड़ों भारतीय मूल के लोगों को आपस में जोड़े रखने का काम हिंदी भाषा करती है. फिजी, मारीशस, सूरीनाम, गयाना देशों में और नेपाल की कुछ जनता भी हिंदी बोलती है. इसके अतिरिक्त यह विश्व के अनेक देशों में पढ़ाई व सराही जाती है. हिंदी में कई बोलियाँ और उप बोलियाँ हैं जैसे अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी आदि जो इसको समृद्ध करती हैं. ४ अक्तूबर १९७६ को उस समय के विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना भाषण  हिंदी में देकर विश्व के सामने हिंदी के गौरव को बढ़ाया था. आज हिंदी राष्ट्र भाषा, राज भाषा, सम्पर्क भाषा, जन भाषा की सीढ़ियाँ चढती हुई अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनने की ओर अग्रसर है.

हिंदी संसार की उन्नत भाषाओँ में सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है, यह सरल तथा लचीली भाषा है. यह अन्य भाषाओँ के शब्दों को अपनाने में संकोच नहीं करती. इसके पास वैज्ञानिक लिपि है. इसकी शब्द संपदा अपार है. हिंदी का साहित्य बहुत भरपूर है. यह आम जनता से जुड़ी भाषा है. कम्प्यूटर और इंटरनेट पर भी हिंदी ने अपने पांव जमा लिए हैं बड़ी संख्या में हिंदी में लोग इंटरनेट पर लिख रहे हैं.   

इतना सब होते हुए भी देश में हिंदी को जो स्थान मिलना चाहिए था, अभी तक नहीं मिला है. संविधान की धारा ३४३ के अनुसार हिंदी को १४ सितम्बर १९४९ को राजभाषा का दर्जा दिया गया था, उस समय यह निर्णय लिया गया कि पन्द्रह वर्षों तक हिंदी के साथ अंग्रेजी को भी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया जायेगा उसके बाद स्वतंत्र रूप से हिंदी को राज भाषा का अधिकार मिलेगा. किन्तु आज आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हिंदी को पूर्णतः राजभाषा का दर्जा नहीं मिला है. शायद इसका प्रमुख कारण है सरकारी नौकरियों के लिए अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता. जब तक रोजगार के लिए हिंदी जानना अनिवार्य नहीं किया जायेगा तब तक इसके प्रति उदासीनता का रवैया अपनाया जाता रहेगा. इसे ज्ञान विज्ञान की भाषा भी बनना होगा.

जब देश गुलाम था तब मैकाले ने जिस शिक्षा पद्धति का विकास किया था आज तक हम उसे ढोने पर विवश हैं. भारत में अंग्रेजी बहुत कम लोगों द्वारा बोली जाती है पर बहुसंख्यक लोगों को उसे अपनाने पर विवश होना पड़ता है। किसी देश की सांस्कृतिक विशेषताएं उसकी भाषा में ही छुपी होती हैं, यदि भाषा का विकास नहीं हुआ तो उस देश की संस्कृति का पतन सम्भव है. यदि किसी समाज को अपनी मातृ भाषा को छोड़कर विदेशी भाषा को अपने कामकाज की भाषा बनाना पड़े तो मातृ भाषा की अवनति के साथ-साथ भाषा में संचित वहाँ की सांस्कृतिक धरोहर भी नष्ट होने लगती है. वे उसी भाषा के साहित्य को श्रेष्ठ मानकर उसके पीछे जाते हैं और अपने साहित्य में छिपे ज्ञान की तरफ उनकी दृष्टि नहीं जाती. हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाकर हम न केवल अपने देश की एकता को मजबूत कर सकते हैं बल्कि अपनी प्राचीन संस्कृति के मूल्यों को धारण कर सकते हैं.  


बुधवार, जनवरी 30

बापू के नाम एक पत्र


बापू के नाम एक पत्र


हुए डेढ़ सौ वर्ष आज, जब वसुंधरा पर तुम थे आए 
देवदूत बन घोर तिमिर में, बने प्रकाश पुंज मुस्काए !

जाने किस माटी के बने थे, सत्य की इक मशाल जलाई
कोटि-कोटि भारत वंशी हित, निज सुख-सपन की बलि चढ़ाई !

कोमल पुष्प सा अंतर किन्तु, फौलादी संकल्प जगाये
भारत की जनता को फिर से, मुक्त गगन के स्वप्न दिखाए !

देवभूमि भारत कैसा हो, इसकी नींव तुम्हीं ने रखी
दूर गाँव के सन्नाटे में, हर झोंपड़ी हो सजी हुई !

दीन-हीन दुर्बल न रहें वे, हों किसान अथवा मजदूर 
समुचित श्रम का प्रतिदान मिले, वे समर्थ बनें न कि मजबूर !

तन पर वस्त्र, आश्रय सुंदर, शिक्षा का सम अधिकार मिले
गाँव-शहर में हर व्यक्ति को, सहज ही राष्ट्र का प्यार मिले !

एक देश में रहने वाले, एक सूत्र में बंधे सभी हैं
संविधान की मूल आत्मा, समता और बन्धुता ही हैं !

बापू ! आज हम फख्र से कहते, भारत ने करवट ली है
उसी राह पर चला गर्व से, नींव जिसकी तुमने रखी है !

स्त्री-पुरुष वृद्ध-युवा सभी, भारतभू का निर्माण कर रहे
आदर्शों से प्रेरित नेता, उनमें नव उत्साह भर रहे !

आज गर्व से कह सकते हैं, बापू के सपनों का भारत
दुनिया जिसे निहार रही है, कदम बढ़ाता हँसता भारत !



बुधवार, नवंबर 16

बदल रहा है देश

बदल रहा है देश

लोग निकल रहे हैं घरों से
छोटे-बड़े सब समान होकर खड़े हैं लम्बी-लम्बी कतारों में
जिन्हें एक नहीं कर पाये सद उपदेश और भगवान
उन्हें एक ही कतार में ले आया है इस देश का संविधान
आखिर प्रधानमन्त्री को चुना है जनता ने
उसका संवैधानिक हक है
जनता को जागरूक बनाना
देश से भ्रष्टाचार मिटाना
अब किसी को हिम्मत नहीं होगी
नोटों से भरे तिजोरी
या फिर बेहिसाब कमाई में से करे कर चोरी
अब इस देश का कोई माईबाप है
जिसको देना हर किसी को जवाब है
देश बदल रहा है
हमको भी बदलना है
न कि ‘सब चलता है’ का मन्त्र जपना है
अब यहाँ बेईमानी नहीं चलेगी
अभी तो गंदगी फ़ैलाने वालों की नकेल भी कसेगी
स्वच्छ भारत का सपना अब हकीकत बन रहा है
वाकई देश बदल रहा है !