दिल में उसके हम रहते हैं
वह रहता है अपने दिल में
सुना था जाने कितनी बार,
झाँका जब भी भीतर अपने
पाया केवल यह संसार !
चाह भरी थीं सुख की अनगिन
नाम छोड़ कर जाने की धुन,
खुद के बल पर मिला न जो भी
रब से उसको पाने की धुन !
लेकिन हर ख्वाहिश के पीछे
मांग ख़ुशी की छिपी हुई थी,
कुछ कर के दिखलाने में भी
भीतर एक पुलक जगती थी !
हुई जो पूरी चाह कभी तो
नयी लालसा को जन्मा कर,
एक छलावा, सम्मोहन सा
घिरा रहा अंतर उपवन पर !
तभी किसी ने कहा कान में
शरण में आ जाओ तुम मेरी,
नयन मूंद कर अब जब झाँका
तृप्ति की थी राह सुनहरी !
मन में कौंध गया तब राज
दिल में उसके हम रहते हैं,
जहाँ अभाव कभी न कोई
सुमिरन के दरिया बहते हैं !
