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मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !

शुक्रवार, अप्रैल 11

एक मौन सन्नाटा भीतर

एक मौन सन्नाटा भीतर



सहज कभी था आज जटिल है
कृत्य कुंद जब भाव सुप्त है,
एक मौन सन्नाटा भीतर
हुई शब्दों की धार लुप्त है !

नहीं लालसा, नहीं कामना
जीवन की ज्यों गति थमी है,
इक आधार मिला नौका को
बीच धार पतवार गुमी है !

अब न कहीं जाना राही को
घर से दूर निकल आया है,
ममता के पर कटे मुक्ति का
राग हृदय को अब भाया है !

न कोई संदेश भेजना
 न ही कोई छाप छोड़ना,
लक्ष्य सभी पीछे छूटे हैं
नहीं राम को धनुष तोड़ना !

जीवन, जब जैसा मिल जाये
दोनों बाँह पसारे लेता,
 जहाँ जरूरत जो भी दिखती
अंतर को खाली कर देता !  

मंगलवार, फ़रवरी 18

दिल में उसके हम रहते हैं

दिल में उसके हम रहते हैं



वह रहता है अपने दिल में
सुना था जाने कितनी बार,
झाँका जब भी भीतर अपने
पाया केवल यह संसार !

चाह भरी थीं सुख की अनगिन
नाम छोड़ कर जाने की धुन,
खुद के बल पर मिला न जो भी
रब से उसको पाने की धुन !

लेकिन हर ख्वाहिश के पीछे
मांग ख़ुशी की छिपी हुई थी,
कुछ कर के दिखलाने में भी
भीतर एक पुलक जगती थी !

हुई जो पूरी चाह कभी तो
नयी लालसा को जन्मा कर,
एक छलावा, सम्मोहन सा
घिरा रहा अंतर उपवन पर !

तभी किसी ने कहा कान में
शरण में आ जाओ तुम मेरी,
नयन मूंद कर अब जब झाँका
तृप्ति की थी राह सुनहरी !

मन में कौंध गया तब राज
दिल में उसके हम रहते हैं,
जहाँ अभाव कभी न कोई
सुमिरन के दरिया बहते हैं !