अनगाया यदि रहा गीत
अनगाया यदि रहा गीत जो
गाने आये थे हम भू पर,
खिला नहीं यदि सरसिज उर में
मिले नहीं उड़ने को दो पर !
मधुऋतु अगर न मन में उतरी
फूटी नहीं हृदय की गागर,
सूना रहा घाट उर सर का
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !
अंतर में यदि नहीं लालसा
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !

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