सरहद पर बर्फीले पर्वत
कण-कण में भारत
धरती के
बहता एक शाश्वत
सँजीवन,
दूर पूर्वी अंचल
में जब
उगती नभ में
अरुणाभ, नमन !
सरहद पर बर्फीले
पर्वत
कहीं सिंधु,
रेतीले निर्जन
रक्षित करने को
तत्पर है
सेनानी का तन मन
अर्पण !
जयहिन्द मधुर नाद
गूँजता
अंतर में हिलोर
इक उठती,
नदिया, पर्वत, कानन, अम्बर
हर कोने को छू
विहंसती !
पुण्य भूमि यह
पुण्य शील है
राम, कृष्ण, बुद्धों की आभा,
गंगा, कावेरी, सतलज से
सिंचित है जन-जन
की आशा !
आज नवल रवि दस्तक
देता
कोटि-कोटि
भाारतवासी को,
पुरुषार्थ कर इसे संवारें
अवसर मिलता
सौभागी को !
