थामता है हर घड़ी वह
बूँद बनकर जो
मिला था
सिंधु सा वह बढ़ा
आता,
रोशनी की इक किरण
था
बन उजाला पथ
दिखाता !
थामता है हर घड़ी
वह
जो बरसता प्रीत
बनकर,
खोल देता द्वार
दिल के
फिर सरसता गीत
बनकर !
हर नुकीली राह को
भी
मृदु गोलाई में
बदले,
कंटकों से जो भरी
थी
मधु अमराई में
बदले !
बस गया है आज दिल
में
डाल डेरा और डंडा,
दूर से जो था
पुकारे
मिल गया उसका
ठिकाना !


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