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बुधवार, जुलाई 5

थामता है हर घड़ी वह


थामता है हर घड़ी वह

बूँद बनकर जो मिला था
सिंधु सा वह बढ़ा आता,
रोशनी की इक किरण था
बन उजाला पथ दिखाता !

थामता है हर घड़ी वह
जो बरसता प्रीत बनकर,
खोल देता द्वार दिल के
फिर सरसता गीत बनकर !

हर नुकीली राह को भी
मृदु गोलाई में बदले,
कंटकों से जो भरी थी
मधु अमराई में बदले !

बस गया है आज दिल में
डाल डेरा और डंडा,
दूर से जो था पुकारे
मिल गया उसका ठिकाना !


सोमवार, जुलाई 27

जीवन बंटता ही जाता है



जीवन बंटता ही जाता है


बाँट रहा दिन-रात हर घड़ी
खोल दिए अकूत भंडार,
 युगों-युगों से जग पाता है
डिगता न उसका आधार !

शस्य श्यामला धरा विहंसती
जब मोती बिखराए अम्बर,
पवन पोटली भरे डोलती
केसर, कंचन महकाए भर !

जा सिन्धु में खो जाती हैं
जल राशियाँ भर आंचल में,
नीर के संग-संग नेह बांटती
तट हो जाते सरस हरे से !

जीवन बंटता ही जाता है
मानव उर क्यों सिमट गया,
उसी अनंत का वारिस होकर
क्यों न जग में बिखर गया !

गुरुवार, जून 19

मधुर अमराई में बदले


मधुर अमराई में बदले


थामता है हर घड़ी वह
जो बरसता प्रीत बनकर,
खोल देता द्वार दिल के
फिर सरसता गीत बन कर !

हर नुकीले रास्ते को
मृदु गोलाई में बदले,
कंटकों से जो भरी थी
मधुर अमराई में बदले !

मरहम रखता दर्द हरता
हर कदम पर साथ देता,
पोंछ देता दुःख इबारत
या नये से अर्थ देता !

बूंद बनकर जो मिला था
सिन्धु सा वह बढ़े आता,
रोशनी की इक किरण था
बन उजाला चढ़े आता !

दूर से था जो पुकारे
बस गया है दिल में आके,
डाल डेरा और डंडा
पा गया हो ज्यों ठिकाने !