भेद - अभेद
यह चाह कि कोई देखे
फूल को खिलने नहीं देगी
वह तो अच्छा है कि
किसी फूल को यह चाह नहीं होती
बड़ा फ़ासला है तेरे मेरे बीच
इसी चाह के कारण
वरना यह मुहब्बत कब की
परवान चढ़ गयी होती
पलकें उठा के देखते हैं वह
नज़रें किसी की टिकी हैं या नहीं
अपनी सीरत पे यक़ीन नहीं आता
हसीनों को भी
ज़िंदगी जैसी भी है
खूबसूरत है
लाइक्स की चाह ने इसे
क्या से क्या न बना दिया
देखने वाला भी वही
देखा गया भी वही
क्यों भेद की दीवार कोई
बीच में उठा गया !
