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शुक्रवार, अगस्त 14

स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हार्दिक शुभकामनायें

 देश हमारा 

 

सदा सत्य की राह दिखाता

गीत शांति का रहे सुनाता, 

‘वसुधैव कुटुंबकम’ मानकर 

सदा सभी का सुहित चाहता !

 

देश हमारा आगे बढ़ता 

सुख-समृद्धि के मार्ग खोलता, 

हर आपदा को दे चुनौती 

हँसकर मिलकर उसको सहता !

 

शांति यहाँ का मूलमन्त्र है 

परम अनूठा लोकतंत्र है, 

साथ निभाता सब देशों का 

कोरोना जब विश्व झेलता !

 

लहर तिरंगा यही सुनाए

भारत की संस्कृति फैलाये, 

राम-कृष्ण की पावन धरती    

कण-कण इसका प्रीत सिखाये !

 

हर मन में आह्लाद भरा  है 

आज स्वतन्त्रता दिवस मनाएं, 

महिमामय भविष्य सम्मुख है 

धैर्य से वर्तमान निभाएं !

 


स्वतन्त्रता दिवस पर

स्वतन्त्रता दिवस पर

भर जाता है भीतर जोश
क्रम बद्ध उठने लगते हैं कदम
मन में दौड़ जाती है
यादों की एक लम्बी कतार
बचपन में गाये देशभक्ति के तराने
चंद्रशेखर आजाद और नेता जी के फसाने
 याद आते हैं हजारों अनाम शहीद  
घुल जाती है लड्डुओं की मिठास
समाती है उज्ज्वल भविष्य की आस
रश्क होता है भारत माँ की लालना पर
पुराणों, वेदों से की संस्कारित पालना पर
आत्मा सहज ही मुस्का उठती है
देख तिरंगे को लहराते  
आओ मिल कर मनाएं
 ‘स्वतन्त्रता दिवस’ हँसते-गाते 

गुरुवार, अगस्त 14

स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें

स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें 

आजादी ! आजादी ! आजादी !
मांग है सबकी आजादी,
कीमत देनी पड़ती सबको
फिर भी चाहें आजादी !

नन्हा बालक कसमसाता
हो मुक्त बाँहों से जाने,
किशोर एक विद्रोह कर रहा
माता-पिता के हर नियम से !

नहीं किसी का रोब सहेंगे
तोड़-फोड़ कर यही दिखाते,
हड़तालों से और नारों से
अपनी जो आवाज सुनाते !

इस आजादी में खतरे हैं
बंधन की अपनी मर्यादा,
एक और आजादी भी है
जब बंधन में भी मुक्त सदा !

ऊपर का बंधन तो भ्रम है
मन अदृश्य जाल में कैदी,
उस जाल को न खोला तो
ऊपर की मुक्ति भी झूठी !

छोड़-छाड सब भाग गया जो
सन्यासी जो मुक्त हुआ है,
मन के हाथों बंधा है अब भी
उसको केवल भ्रम हुआ है !

 उस असीम की चाह बुलाती
मानव कैद का अनुभव करता,
निमित्त बनता बाहरी बंधन  
असल में उसका मन बांधता !

जिसका रूप अनंत हो व्यापक
कैसे वह फिर कैद रहे,
खुला समुन्दर जैसा है जो
क्योंकर सीमाओं में बहे !

मुक्ति का संदेश दे रहे
खुले व्योम में उड़ते पंछी,
मत बांधो पिंजर में मन को
गा गा गीत सुनाते पंछी ! 

जिसके लिये गगन भी कम है
उसे कैद करते हो तन में,
जो उन्मुक्त उड़ान चाहता
कैसे वह सिमटेगा मन में !

पीड़ा यही, यही दुःख साले
सारे बंधन तोड़ना चाहे,
लेकिन होती भूल यहाँ है
असली बंधन न पहचाने !


बुधवार, अगस्त 14

स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर

स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर



याद आ रहीं वे गाथाएं
सुनकर जिनको बीता बचपन,
शौर्य, वीरता, बलिदानों से
 थी सिचिंत जिनकी हर धड़कन !

आजादी अनमोल दिलाई
स्वयं के सुख-दुःख जो भूले थे,
‘करो या मरो’ के नारे संग
बढ़े, गर्व से वे से फूले थे !

भारत की संस्कृति का गौरव
स्मृति पटल पर आज छा रहा,
बसी है खुशबू मन में जिसकी
हर युग का इतिहास भा रहा !

काश्मीर का केसर महके
ताजमहल की सुन्दरता भी,
हिम से आच्छादित गिरिवर हैं
गंगा, यमुना का अमृत भी !

सतलज, रावी और चिनाब
कल-कल करतीं बुनती ख्वाब,
अमृतसर के हर मन्दिर में
झुका रहा है सिर पंजाब !

काशी के वे घाट अनोखे
शिव, गौरी के सुन्दर धाम,
संगम पर जुड़ता है कुम्भ
पुण्य भूमि हे ! तुम्हें प्रणाम !

वीर बाँकुरे मारवाड़ के
महल, हवेली  गाथा कहते,
महाराणा के अस्त्र देखकर
चकित हुए से दर्शक रहते !

दक्षिण हो या तट पश्चिमी
सागर की लहरों का जाल,
सीमाओं पर सजग सिपाही
उन्नत है भारत का भाल !